बीजेपी हाईकमान पर फिर भारी पड़ीं वसुंधरा राजे

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वसुंधरा राजे का अपने विश्नसनीय नेताओं को टिकट दिलाना कहीं ना कहीं आरएसएस और केंद्रीय नेतृत्व के प्रभाव को न्यूट्रल करने की दिशा में बड़ी कामयाबी मानी जा रही है। क्योंकि, जब भी आरएसएस या केंद्रीय नेतृत्व ने राजे पर हावी होने की कोशिश की है उन्होंने अपने विश्वासपात्रों के समर्थन से विषम परिस्थितियों को अपने हक में कर लिया है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण गुलाब चंद कटारिया हैं। 2012 में प्रदेश के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया ने मेवाड़ रिजन में चुनावी यात्रा निकालने की कोशिश की। उस दौरान आरएसएस की तरफ से उन्हें बतौर मुख्यमंत्री कैंडिडेट प्रॉजेक्ट किया जा रहा था।
कटारिया के इस पहल को समय रहते ही वसुंधरा राजे ने भांप लिया और तुरंत ही उन्होंने अपने 50 विधायकों के साथ बीजेपी छोड़ने की धमकी दे डाली। नतीजा रहा कि गुलाब चंद कटारिया को अपनी यात्रा स्थगित करनी पड़ी।
राजस्थान विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है। पहली सूची जारी होते ही साफ हो गया कि राजस्थान बीजेपी का असली बॉस अभी भी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ही हैं। सूची में शामिल 131 चेहरों में 85 सीटिंग एमएलए को टिकट दिया गया है।
पुराने विधायकों को दोबारा टिकट देना दर्शाता है कि टिकट वितरण में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का दबदबा पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर पूरी तरह हावी रहा है। सूत्रों के मुताबिक वसुंधरा ने 2013 विधानसभा चुनाव में विजयी उम्मीदवारों को दोबारा टिकट देने के लिए काफी दबाव बनाया।
बीजेपी के भीतर वसुंधरा राजे का मुख्यमंत्री बने रहना किसी चुनौती से कम नहीं रहा है। 2013 में जैसे ही वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री बनीं तब से उन्हें पद से हटाने की चर्चा जारी रही। उनको सीएम पद से हटाने की मुहिम ख़ास तौर पर तब और जोर पकड़ी जब ललित मोदी कांड और खनन घोटाला सामने आया।
2015 में ही पार्टी के उपाध्यक्ष ओम माथुर को उनकी जगह स्थापित करने की मुहिम चली। लेकिन, राजे अपने पद पर जस की तस बनी रहीं। यही नतीजा रहा कि पार्टी के कद्दावर नेता घनश्याम तिवारी ने बीजेपी को अलविदा कहकर नई पार्टी का गठन कर लिया। घनश्याम तिवारी ने भी केंद्रीय नेतृत्व पर राजे को हटाने के पूरा दबाव डाला था।
पिछले साल वसुंधरा राजे के लिए राजस्थान की राजनीति में खुद को शीर्ष पर बनाए रखना बड़ी चुनौती से कम नहीं रहा। किसान आंदोलन, आनंद पाल सिंह का एनकाउंटर और उसके बाद राजपूत समाज का प्रदर्शन, गऊ रक्षा दल, मॉब लिंचिंग और मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला विवादित ऑर्डिनेंस।
ये तमाम मुद्दे उन्हें उनके पद से हटाने के लिए काफी थे। यही नहीं अलवर और अजमेर लोकसभा उपचुनाव और इन जिलों के तमाम 16 विधानसभा सीटों से बीजेपी का पत्ता साफ होने के बाद तो पार्टी का एक धड़ा उनके नेतृत्व को कबूल करने के मूड में बिल्कुल नहीं था।
विधानसभा चुनाव 2018 के प्रचार के दौरान भी रैली स्थलों पर ‘मोदी तुझसे बैर नहीं, रानी तेरी खैर नहीं’ के नारे खूब सुनने को मिले। लेकिन, इन तमाम विषम परिस्थितियों के बावजूद वसुंधरा राजे अपने पद पर कायम रहीं।
उपचुनावों में मिली शिकस्त के बाद राज्य के अध्यक्ष अशोक प्रणामी ने तो इस्तीफा दे दिया। दबाव वसुंधरा पर भी था। लेकिन, वह केंद्रीय नेतृत्व के सामने अपनी शर्तों के साथ खड़ी रहीं। प्रदेश अध्यक्ष की सीट खाली होने के बाद बीजेपी हाईकमान ने गजेंद्र सिंह शेखावत का नाम आगे किया।
लेकिन, राजे कैंप के नेताओं ने उनका नाम खारिज कर दिया। बदले में तर्क दिया गया कि गजेंद्र सिंह शेखावत की वजह से जाट वोटर छिटक जाएंगे। इसके बाद ही हाईकमान ने मदन लाल सैनी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया।
आगामी विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व जिन नामों को आगे किया है उससे वसुंधरा राजे को सियासी मैदान में खुलकर खेलने का मौका दे दिया। उनकी इस नई ताकत से आरएसएस से जुड़े कुछ बड़े नेता भी मौन हो चुके हैं। नई सूची पर गुलाब चंद कटारिया, अरुण चतुर्वेदी और वासुदेव देवानी जैसे नेता खामोश हैं।
पहली सूची में ख़ास बात यह है कि इसमें कोई भी मुसलमान उम्मीदवार नहीं है। यहां तक कि वसुंधरा राजे के ख़ास माने जाने वाले और कैबिनेट में नंबर दो की हैसियत रखने वाले यूनुस ख़ान को भी टिकट नहीं मिला है।
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हालांकि, कुल मिलाकर शुरू से लेकर अब तक राजस्थान में तमाम सियासी समीकरण वसुंधरा राजे ने अपने पक्ष में ही रखा है। परिस्थिति चाहें जैसी भी हो उन्होंने अपने मन-माफिक ही कार्य-प्रणाली रखी है।

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