DM राजशेखर गाड़ी में बैठकर भाग निकले और मुझे 500 की भीड़ में अकेला छोड़ दिया… ADG अशोक सिंह का दर्दनाक खुलासा!

राष्ट्रीय जजमेंट

मुरादाबाद। 6 जुलाई साल 2011…। मैनाठैर बवाल। इस तारीख और बवाल का जिक्र आते ही वीभत्स पूरा मंजर उभर आता है कि कैसे उपद्रवियों ने आमजन को दूर खाकी वालों को भी नहीं बख्शा।
स्थिति तब और आसामान्य हो गई तब तत्कालीन डीएम व वर्तमान में एमडी जलनिगम राजशेखर डीआइजी को अकेला छोड़कर गाड़ी में बैठकर भाग निकले।

उनके पीछे ही डीआइजी की गाड़ी और उनकी स्कार्ट भी भाग गई। इसी के बाद उपद्रवियों ने खाकी की टीम का नेतृत्व कर रहे तत्कालीन डीआइजी/एसएसपी अशोक कुमार सिंह को ही पहला निशाना बना लिया। आत्मरक्षार्थ हवाई फायरिंग के बाद भी उपद्रवी नहीं मानें और जान बचाने के लिए पेट्रोल पंप में पहुंचे।

डीआइजी को बाहर निकालकर मरणासन्न कर लूटपाट कर भाग गए। डीआइजी ने प्रकरण में कोर्ट में जब गवाही दी, तब उनका दर्द छलक उठा। पेश हैं तत्कालीन डीआइजी एवं वर्तमान में एडीजी भर्ती बोर्ड अशोक कुमार सिंह के बयान, उनकी जुबानी :

छह जुलाई 2007 को गांव असालतनगर वघा में लोगों ने पुलिस के खिलाफ एकत्रित होकर और पास का रोड जाम कर दिया। जहां तत्कालीन एसपी ग्रामीण व अन्य फोर्स को भेजा गया। किन्तु उनके समझाने पर भीड़ नियंत्रित नहीं हुई और भीड़ ने पथराव करना शुरू कर दिया। सूचना पर तत्कालीन जिलाधिकारी राजशेखर को साथ लेकर वहां पर पहुंचा।

वहां पहुंचकर भीड़ के पार अपनी गाडियों से नीचे आये और गनर से लाउड हेलर तथा लाठी मंगाई। इस बीच जिलाधिकारी अपनी गाडी में बैठकर भाग गये और उनकी गाडी के पीछे मेरी गाडी और मेरे स्कार्ट की गाडी भाग गई। मौके पर मैं और पीआरओ रवि कुमार ही बचे। हम दोनों पर भीड ने, जिसकी संख्या लगभग 500 होगी, हमला बोल दिया।
मैंने भीड़ को समझाने का प्रयास किया, किन्तु भीड़ ने लाठी, डंडा, सरिया व पत्थर से हमारे ऊपर हमला कर दिया। स्थिति को गंभीर समझते हुए रक्षात्मक कार्रवाई करते हुए अपनी सर्विस पिस्टल से भीड़ को तितर-बितर करने के उद्देश्य से हवाई फायरिंग की। परंतु भीड़ ने आक्रामक होकर मेरे ऊपर तथा मेरे पीआरओ के ऊपर हमला कर दिया।

इससे मेरे सिर पर तथा शरीर के कई भागों पर चोटें आयीं। इनके द्वारा पहुंचाई गयी चोटों के परिणामस्वरूप मैं बेहोश हो गया। कुछ समय बाद इंस्पेक्टर एसकेएस प्रताप और उनके हमराह कर्मियों द्वारा मुझे वहां से बचाकर सांई हास्पिटल मुरादाबाद लाकर भर्ती किया, जहां पर मेरा इलाज चलता रहा। मैं लगभग तीन दिन बाद होश में आया।

सांई हास्पिटल से छुटटी मिलने के बाद मैंने अपना इलाज फोर्टिस हास्पिटल, नोएडा तथा एम्स दिल्ली कराया। यह इलाज लगभग एक साल तक चलता रहा, तब जाकर मैं सामान्य स्थिति में पहुंचा। तीन बाद जब मुझे होश, तब जाकर मुझे पता चला कि मेरा सर्विस पिस्टल तथा पर्स, जिसमें कुछ रूपये तथा व्यक्तिगत सामान था, भीड़ के लोग छीनकर ले गये थे।

घटना के समय मैं जो कपड़े पहने हुए था, उन पर मारपीट के कारण निकला खून कपड़ों में लगा था। मेरे कपड़े प्रकरण के विवेचक द्वारा लिये गये थे तथा उसकी फर्द भी बनाई गई थी। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए फायरिंग की गयी थी। तीन-चार फायरिंग हुई थी।
भीड़ की तरह से भी फायरिंग हुई थी। मैंने जो फायरिंग की थी, हवाई की थी। फायरिंग का उद्देश्य क्षति पहुंचाने का नहीं था। अपितु तितर-बितर करने का था। मेरा पिस्टल विवेचक द्वारा बरामद किया गया था। घटनास्थल पर पेट्रोल पंप था। पेट्रोल पंप पर अपने घुसने का व अपने-आपको बचाने का प्रयास किया था। मुझे अस्पताल पुलिस वाले ले गए थे।

पेट्रोप पंप सेल्समैन…उपद्रवियों ने डीआइजी पर गाेली भी थी दागी

जान बचान के लिए डीआइजी डींगरपुर के जिस एमएम तुर्की पेट्रोल पंप पर पहुंचे थे। प्रकरण में पंप के सेल्समैन संतराम सिंह ने भी बयान दर्ज कराए। उन्होंने बताया कि हमले से बचने के लिये डीआइजी व उनके साथ दरोगा जान बचाकर हमारे पेट्रोल पंप की तरफ भागे थे।

भीड़ भी उनके पीछे लाठी-डंडे हाथ में लेकर व पथराव करती हुई पेट्रोल पंप पर आ गई थी और मारपीट करने लगी थी। खुद को बचाने के लिये डीआइजी साहब व उनके साथ दरोगा ने फायर भी किये थे, लेकिन भीड़ नहीं हटी थी। तब किसी ने भीड़ में से डीआइजी साहब पर फायर कर दिया, जो मेरे दाहिने हाथ में लगा था।

भीड़ ने आफिस के बाहर भी फायर किये थे। गोली लगने से मैं वही गिर गया था। भीड़ ने आफिस में काफी तोड़फोड़ की थी व आफिस में रखा कैश भी लूट लिया था। कुछ देर बाद काफी पुलिस आ गई थी। कुछ दंगाईयों को पकड़ लिया था।

मुझे मेरे भांजे गुड्डे ने सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया था भीड़ हजारों आदमियों की थी। घटना में रिहान भी घायल हुआ था। मेरे साथ तीन लोग घायल हुए थे। उनमें से एक बाद में मर गया था।

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