भारत-कोरिया के बीच बना सांस्कृतिक सेतु: दिल्ली में कोरियाई भाषा में ‘गीता दर्शन’ का ऐतिहासिक विमोचन

नई दिल्ली: भारत और दक्षिण कोरिया के बीच सांस्कृतिक संबंधों को एक नई ऊंचाई देते हुए नई दिल्ली के श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (SLBSNSU) में ‘संस्कृत और गीता दर्शन’ पर आधारित दो महत्वपूर्ण ग्रंथों का ऐतिहासिक विमोचन किया गया। तत्वम फाउंडेशन फॉर पॉलिसी एंड रिसर्च द्वारा आयोजित इस समारोह ने भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान को वैश्विक मंच, विशेषकर पूर्वी एशिया तक पहुँचाने की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाया है।

इस उच्च-स्तरीय कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण कोरियाई भाषा में अनुवादित दो प्रमुख कृतियों का अनावरण रहा। इसमें चंद्रिका शर्मा द्वारा अनुवादित ‘गीता के चार योग’ और कोरियाई संस्कृत विद्वान वेन. भिक्षु डोवंग द्वारा अनुवादित ‘भक्ति शतकम’ शामिल है। ये ग्रंथ न केवल भगवद गीता के मूल सिद्धांतों को कोरियाई दर्शकों के लिए सुलभ बनाएंगे, बल्कि भारत की समृद्ध भक्ति विरासत और सार्वभौमिक आध्यात्मिक संदेश को भी मजबूती से प्रस्तुत करेंगे।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कहा कि संस्कृत केवल भारत की प्राचीन भाषा नहीं है, बल्कि एक जीवंत परंपरा है जो आज भी वैश्विक बौद्धिक संवाद का नेतृत्व कर रही है। मुख्य अतिथि और ‘ज्ञानभारतम’ के परियोजना निदेशक प्रो. अनिर्बान दास ने इन ग्रंथों को भारतीय दर्शन की आत्मा बताते हुए कहा कि ऐसे शैक्षणिक प्रयासों से भारत की सांस्कृतिक पहचान और बौद्धिक शक्ति का वैश्विक स्तर पर प्रसार होता है।

समारोह में दक्षिण कोरिया के वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु वेन. ए. जंग वू जी और दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. रंजना मुखोपाध्याय ने भी शिरकत की। वक्ताओं ने इस पहल को तेजी से बढ़ते वैश्वीकरण के दौर में एक “सांस्कृतिक सेतु” करार दिया। “वंदे मातरम” की गूँज से शुरू हुआ यह कार्यक्रम राष्ट्रगान के साथ संपन्न हुआ। विद्वानों ने तत्वम फाउंडेशन की इस पहल की सराहना करते हुए इसे दुनिया के मंच पर भारत की “राष्ट्रीय चेतना” स्थापित करने वाला दूरदर्शी कदम बताया।

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