सीबीएसई की त्रि-भाषा नीति का अभाविप ने किया स्वागत, कहा भाषाई विविधता के संरक्षण में मील का पत्थर होगा यह निर्णय

नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) द्वारा आगामी शैक्षणिक सत्र से नौवीं कक्षा के लिए त्रि-भाषा नीति को अनिवार्य रूप से लागू करने के फैसले का अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) ने पुरजोर स्वागत किया है। अभाविप का कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा के अनुरूप लिया गया यह निर्णय देश के भाषाई वैभव को समृद्ध करने और सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। संगठन ने इस नीति को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए सीबीएसई से एक बड़ी मांग भी की है कि भविष्य में बोर्ड परीक्षाओं का आयोजन भी तीनों भाषाओं में किया जाना चाहिए ताकि इसका दीर्घकालिक लाभ मिल सके।

अभाविप के केंद्रीय नेतृत्व का मानना है कि भारत मूल रूप से एक बहुभाषी समाज है, जहां छात्र अपनी सहूलियत के हिसाब से अलग-अलग स्तरों पर कई भाषाओं का उपयोग करते हैं। ऐसे में छात्रों को एक से अधिक भारतीय भाषाओं में संवाद करने के योग्य बनाना समय की मांग है। इस नीति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि चुने जाने वाली तीन भाषाओं में से कम से कम दो भाषाओं का भारतीय मूल का होना अनिवार्य किया गया है। भारतीय भाषाओं में व्याकरण, वाक्य संरचना और सांस्कृतिक संदर्भों में काफी समानता होती है, जिसके कारण छात्र बिना किसी अतिरिक्त मानसिक तनाव के सहज रूप से एक साथ कई भाषाएं सीख सकेंगे। बोर्ड द्वारा संथाली, मैथिली, डोगरी और कोंकणी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल कर कुल 44 भाषाओं का विकल्प देना बेहद सराहनीय कदम है।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने इस नीति पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि सीबीएसई का यह निर्णय भारतीय शिक्षा के स्वदेशीकरण और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने की दिशा में एक बहुत ही सकारात्मक कदम है। आज के समय में रोजगार और उच्च शिक्षा के लिए छात्रों का एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना बेहद आम हो गया है। ऐसे में अन्य भारतीय भाषाओं का ज्ञान छात्रों के करियर और सामाजिक जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी साबित होगा। उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में किताबों की उपलब्धता और शिक्षकों की कमी जैसी कुछ व्यावहारिक चुनौतियां जरूर आ सकती हैं, लेकिन बोर्ड ने इसके लिए जो लचीले समाधान दिए हैं, वे स्वागत योग्य हैं।

अभाविप ने इस बात पर भी प्रसन्नता व्यक्त की है कि इस नीति में छात्रों को मुख्य बोर्ड परीक्षा के भारी तनाव से बचाने का पूरा ध्यान रखा गया है। इसके तहत तीसरी भाषा का मूल्यांकन पूरी तरह से विद्यालय स्तर पर आंतरिक रूप से किया जाएगा, जिससे छात्र बिना किसी डर या दबाव के आनंदपूर्वक नई भाषा को सीख सकेंगे। हालांकि, संगठन का यह भी स्पष्ट मत है कि भाषाएं केवल सीखने तक ही सीमित न रहें, बल्कि उनका सही मूल्यांकन भी जरूरी है। इसीलिए अभाविप मांग करती है कि अध्ययन के साथ-साथ मुख्य बोर्ड परीक्षाओं को भी तीनों भाषाओं के विकल्प के साथ आयोजित किया जाए। यह कदम इस ऐतिहासिक नीति को और अधिक व्यावहारिक और परिणामोन्मुखी बनाएगा जो विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने में मददगार होगा।

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