टेलीग्राम पर ‘जामतारा ऑफिशियल डेवलपर’ बनकर बेचता था खतरनाक हैकिंग ऐप, साइबर पुलिस ने मास्टरमाइंड को दबोचा, 11 मोबाइल समेत भारी बरामदगी

नई दिल्ली: दिल्ली के सेंट्रल जिले की साइबर थाना पुलिस टीम ने ऑनलाइन धोखाधड़ी और मोबाइल हैकिंग करने वाले एक बेहद शातिर अंतरराज्यीय साइबर ठग गिरोह का भंडाफोड़ किया है। पुलिस ने इस मामले में रिमोट एक्सेस और जासूसी वाले खतरनाक एपीके वायरस एप्लीकेशन बनाने व सप्लाई करने वाले मुख्य मास्टरमाइंड को उत्तर प्रदेश से गिरफ्तार करने में बड़ी सफलता हासिल की है। गिरफ्तार मुख्य आरोपी की पहचान अभय साहनी (25 वर्ष) निवासी देवरिया, उत्तर प्रदेश के रूप में हुई है, जबकि इसके सहयोगी उमेश कुमार रजक (25 वर्ष) निवासी गोरखपुर, उत्तर प्रदेश को पुलिस पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है। पुलिस टीम ने मुस्तैदी दिखाते हुए मुख्य आरोपी अभय के कब्जे से भारी मात्रा में डिजिटल उपकरण—जिसमें 11 महंगे मोबाइल फोन (5 आईफोन और 3 गूगल पिक्सेल समेत), 11 डेबिट कार्ड, 8 सिम कार्ड और एक बेहद आधुनिक लेजर नैनो एस प्लस क्रिप्टो हार्डवेयर वॉलेट बरामद किया है। इसके साथ ही भाई के नाम पर खरीदी गई एक संदिग्ध कार को भी जांच के दायरे में लिया गया है। इस कार्रवाई से साइबर पुलिस ने ऐप के जरिए लोगों के फोन का रिमोट एक्सेस लेकर बैंक खाते खाली करने वाले एक बड़े सिंडिकेट को नेस्तनाबूद कर दिया है।

सेंट्रल जिले के डीसीपी रोहित राजबीर सिंह ने बताया कि साइबर थाने में एक पीड़ित ने ऑनलाइन धोखाधड़ी के संबंध में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके बाद बीएनएस की धारा 318(4) के तहत एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई थी। पीड़ित ने बताया था कि उसके पास एक अज्ञात व्यक्ति का फोन आया, जिसने खुद को बिजली विभाग का कर्मचारी बताते हुए डराया कि यदि तुरंत भुगतान नहीं किया गया तो उसका बिजली मीटर काट दिया जाएगा। इसके बाद ठग ने पीड़ित के व्हाट्सएप पर ‘कस्टमर सपोर्ट एपीके’ नाम की एक फाइल भेजी और उसे फोन में इंस्टॉल करवा दिया। जैसे ही पीड़ित ने उस ऐप को इंस्टॉल किया, ठगों को उसके फोन का पूरा रिमोट एक्सेस मिल गया और उन्होंने पलक झपकते ही अलग-अलग डिजिटल ट्रांजैक्शन के जरिए पीड़ित के खाते से 1,20,999 रुपये उड़ा दिए।

मामले की तकनीकी जटिलता और वायरस ऐप के इस्तेमाल को देखते हुए सेंट्रल जिले के एसीपी (ऑपरेशंस) पदम सिंह राणा के मार्गदर्शन और साइबर थाने के एसएचओ इंस्पेक्टर योगराज दलाल के सुपरविजन में एक विशेष तकनीकी टीम का गठन किया गया। इस टीम का नेतृत्व सब-इंस्पेक्टर रणविजय सिंह कर रहे थे, जिन्हें हेड कांस्टेबल संदीप और हेड कांस्टेबल परमवीर का सहयोग प्राप्त था। जांच टीम ने जब ठगी में इस्तेमाल किए गए एपीके फाइल के बैकएंड आर्किटेक्चर की जांच की, तो पता चला कि यह एक एफयूडी मैलिशियस ऐप था, जिसे इस तरह डिजाइन किया गया था कि कोई भी एंटीवायरस या सिक्योरिटी सिस्टम इसे पकड़ न सके। तकनीकी जांच के शुरुआती चरण में पुलिस ने 5 दिसंबर 2025 को गोरखपुर के रहने वाले उमेश कुमार रजक को गिरफ्तार किया था, जो इन ऐप्स को ठगों तक पहुंचाता था।

उमेश से मिली कड़ियों, डिजिटल ट्रेल्स और संचार रिकॉर्ड के बारीक विश्लेषण के दौरान पुलिस को दो टेलीग्राम आईडी के बारे में पता चला, जहां से ये खतरनाक ऐप्स खरीदे जा रहे थे। तकनीकी सर्विलांस और डिजिटल सबूतों के आधार पर पुलिस इस टेलीग्राम चैनल के एडमिन और मुख्य डेवलपर अभय साहनी तक पहुंची। इसके बाद दिल्ली पुलिस की विशेष टीम ने उत्तर प्रदेश के देवरिया में योजनाबद्ध तरीके से छापेमारी की और 14 मई को मास्टरमाइंड अभय साहनी को सफलतापूर्वक धर दबोचा।

गहन पूछताछ के दौरान आरोपी अभय साहनी ने खुलासा किया कि वह टेलीग्राम पर ‘जामतारा ऑफिशियल डेवलपर’ नाम से चैनल चलाता था और देश के अलग-अलग राज्यों के साइबर अपराधियों को लगभग 4,000 रुपये प्रति ऐप के हिसाब से ये खतरनाक हैकिंग टूल बेचता था। सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि आरोपी अभय केवल 8वीं कक्षा तक पढ़ा है। उसने साइबर फ्रॉड, ऐप डेवलपमेंट, एंटी-डिटेक्शन सिस्टम और रिमोट एक्सेस से जुड़ी यह बेहद जटिल तकनीकी जानकारी किसी संस्थान से नहीं, बल्कि यूट्यूब वीडियो, टेलीग्राम ग्रुप्स और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए सीखी थी। धीरे-धीरे उसने ऑनलाइन माध्यमों से इस काले धंधे में विशेषज्ञता हासिल कर ली। उसने कुबूल किया कि वह अब तक 40 से 50 ऐसे वायरस ऐप विभिन्न ठगों को बेच चुका है और खुद भी करीब 20 से 25 लोगों को अपना शिकार बना चुका है। पुलिस अब उसके वित्तीय लेनदेन और पूरे देश में फैले इस नेटवर्क के अन्य सदस्यों का पता लगाने के लिए आगे की जांच कर रही है।

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