घूस नहीं तो मकान नहीं! क्या है JMM के अबुआ योजना की सच्चाई? Himanta Biswa Sarma ने हेमंत सोरेन को घेरा

राष्ट्रीय जजमेंट

झारखंड के दूसरे चरण के चुनाव के लिए प्रचार खत्म हो गया है। 20 नवंबर को राज्य में मतदान होगा और 23 नवंबर को चुनाव के नतीजे आएंगे। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) आदिवासियों के अधिकारों और कल्याण के मुद्दे के साथ चुनावी मैदान में है। लेकिन उनपर सवाल उठ रहे हैं। खुद को आदिवासियों की सशक्त आवाज और उनके अधिकारों की रक्षा करने वाली पार्टी क्या अपने कार्यकाल के दौरान उनके जीवन में कोई ठोस बदलाव ला पाई है?

हेमंत सोरेन की सरकार ने आदिवासी समाज के लिए कई योजनाएं और वादे किए थे, लेकिन क्या उन्होंने इन्हें धरातल पर उतारा? अबुआ आवास योजना, भूमि अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मोर्चे पर आदिवासी समाज को क्या मिल रहा है?

भाजपा ने अबुआ आवास योजना को लेकर हेमंत सोरेन सरकार को घेरा है। झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा के सह-प्रभारी हिमंत बिस्वा सरमा ने इसको लेकर एक बयान दिया है। उन्होंने कहा, ”झारखंड सरकार की ‘अबुआ आवास योजना’ ‘बाबू आवास योजना’ बन गई है। जब तक घूस नहीं देंगे, तब तक मकान नहीं मिलेगा।”
अबुआ आवास योजना का उद्देश्य और जमीनी हकीकत

अबुआ आवास योजना की शुरुआत 15 अगस्त 2023 को हुई थी। तब हेमंत सोरेन ने वादा किया था कि हम 25 लाख से अधिक झारखंडियों को अबुआ आवास के माध्यम से अपना पक्का छत देंगे। इस योजना के तहत झारखंड के गरीब वर्ग को 2 लाख रुपये में 3 कमरे वाला पक्का मकान देने का वादा किया गया है।

इस योजना का उद्देश्य आदिवासी समुदाय को उनका हक देना और उन्हें सुरक्षित, सस्ते और अच्छे घर मुहैया कराना था। लेकिन जब इस योजना की हकीकत पर नजर डालते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि हेमंत सोरेन सरकार के तहत आदिवासी समाज को अपने हक के लिए न केवल संघर्ष करना पड़ रहा है, बल्कि कई बार उन्हें इस योजना के तहत लाभ पाने के लिए घूस देने की मजबूरी भी उठानी पड़ रही है।

सिर्फ अबुआ आवास योजना के लिए ही नहीं बल्कि आपको सोशल मीडिया पर कई ऐसे आदिवासियों के वीडियो मिल जाएंगे जिसमें दावा किया जा रहा है कि केंद्र सरकार की ओर से दी जाने वाली पीएम आवास योजना के लिए भी उन्हें रिश्व देनी पड़ रही है।

राज्य सरकार के आंकड़े दावा करते हैं कि अबुआ आवास योजना के तहत हजारों आदिवासी परिवारों को घर दिया गया है। झारखंड की अबुआ आवास योजना के तहत वित्तीय वर्ष 2023-24 में दो लाख आवास निर्माण की स्वीकृति दी जा चुकी है। जून 2024 में अबुआ आवास योजना की समीक्षा के दौरान ये जानकारी दी गई थी कि अबुआ आवास योजना के तहत पहले चरण में स्वीकृत किए गए 2 लाख आवास की पहली किस्त की राशि जारी हो गई है। लेकिन ये 2 लाख घर कब तक बनेंगे इसकी जानकारी अब तक सामने नहीं आई है।

अबुआ आवास योजना की अधिकारिक वेबसाइट पर भी इसके तहत कितने घर बनाए गए हैं, इसकी जानकारी नहीं दी गई है। वहां लिखा है कि राज्य सरकार वर्ष 2026 तक सभी बेघर और जीर्ण-शीर्ण घरों में रहने वाले ग्रामीण परिवारों को बुनियादी सुविधाओं सहित पक्का आवास उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। वर्ष 2016 से प्रधानमंत्री आवास योजना – ग्रामीण (PMAY-G) अंतर्गत लगभग 16 लाख घर उपलब्ध कराए गए हैं एवं बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर आवास योजना अंतर्गत लगभग 50 हजार आवास बनाए गए हैं।

अबुआ आवास योजना: भ्रष्टाचार और घोटालों की संभावना

हेमंत सोरेन सरकार के तहत झारखंड में आदिवासी कल्याण के नाम पर कई योजनाएं चलाई गईं, लेकिन इन योजनाओं का वास्तविक लाभ उन्हें पहुंचाने में जो सबसे बड़ी रुकावट आई है, वह है भ्रष्टाचार। अबुआ आवास योजना के मामले में भी आदिवासी समुदाय को घूस की दरारों में धकेल दिया गया है। स्थानीय अधिकारी, जो आदिवासियों के लिए घर देने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, वे खुद को रिश्वत के बदले काम करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।

ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं, जहां आदिवासी परिवारों ने खुलासा किया कि योजना के तहत आवास पाने के लिए उन्हें एक विशेष राशि अधिकारियों को देनी पड़ी है। इसके बिना आवास निर्माण के लिए न तो फंड जारी होते हैं और न ही कोई प्रगति होती है।

अबुआ आवास योजना की जमीन पर वास्तविकता बिल्कुल अलग है। वनइंडिया हिंदी के ग्राउंड रिपोर्ट में नाम न छापने की शर्त पर कई आदिवासी परिवारों का कहना है कि उन्हें योजना का लाभ उठाने के लिए न केवल लंबी नौकरशाही प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ रहा है, बल्कि कई स्थानों पर यह भी आरोप है कि आवास की स्वीकृति के लिए उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है। यह रिश्वत सरकारी अधिकारियों, ठेकेदारों और पंचायत नेताओं को दी जाती है ताकि वे आवास निर्माण के लिए फंड स्वीकृत करें और काम को समय पर पूरा करने की व्यवस्था करें।

अबुआ आवास योजना के तहत कितने घर बने, इस सवाल का उत्तर फिलहाल स्पष्ट नहीं है। राज्य सरकार ने शुरू में दावा किया था कि योजना के तहत लाखों आदिवासी परिवारों को घर मिलेंगे, लेकिन अब तक के आंकड़े बताते हैं कि इस योजना का वास्तविक प्रभाव बहुत ही कम रहा है। जमीन पर स्थिति कुछ और ही दिखती है। अधिकांश आदिवासी इलाकों में लोग यह शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें योजना का कोई वास्तविक लाभ नहीं मिला।

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