वाहन चोरी के मामले में 18 साल से पुलिस को चकमा दे रहा था, एंटी-नारकोटिक्स सेल ने भगोड़े को किया गिरफ्तार

नई दिल्ली: दिल्ली के सेंट्रल जिले की एंटी-नारकोटिक्स सेल ने अपराधियों और भगोड़ों के खिलाफ चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत एक बड़ी सफलता हासिल की है। पुलिस टीम ने वाहन चोरी के एक पुराने मामले में पिछले कई वर्षों से फरार चल रहे ‘घोषित अपराधी’ को गिरफ्तार कर लिया है। गिरफ्तार आरोपी की पहचान अरविंद उर्फ बबलू (50) के रूप में हुई है, जो उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद का रहने वाला है। आरोपी साल 2008 से ही अदालत की कार्यवाही से बचने के लिए लगातार अपने ठिकाने बदल रहा था।

मध्य जिले के डीसीपी रोहित राजबीर सिंह ने मामले का विवरण देते हुए बताया कि जिले में भगोड़े अपराधियों की धरपकड़ के लिए एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है। इसी क्रम में एसीपी ऑपरेशंस पदम सिंह राणा के पर्यवेक्षण और एंटी-नारकोटिक्स सेल के इंचार्ज इंस्पेक्टर रोहित कुमार के नेतृत्व में एक समर्पित टीम का गठन किया गया था। टीम में एएसआई मनीष कुमार, हेड कांस्टेबल अनुज और हेड कांस्टेबल प्रदीप शामिल थे।

जांच टीम ने आरोपी अरविंद उर्फ बबलू के पुराने ठिकानों और तकनीकी रिकॉर्ड को खंगाला। जब पुलिस उसके पते पर पहुंची, तो वह वहां मौजूद नहीं था। पुलिस ने तकनीकी सर्विलांस और स्थानीय मुखबिरों की मदद से उसकी गतिविधियों पर नजर रखना शुरू किया। 27 अप्रैल 2026 को पुलिस को पुख्ता सूचना मिली कि आरोपी गाजियाबाद इलाके में मौजूद है। सूचना मिलते ही पुलिस टीम ने गाजियाबाद के फरीद नगर में जाल बिछाया और मुखबिर की निशानदेही पर आरोपी को दबोच लिया।

पुलिस रिकॉर्ड की जांच करने पर पता चला कि आरोपी अरविंद उर्फ बबलू को साल 1999 में प्रसाद नगर थाने में दर्ज वाहन चोरी के एक मामले में संलिप्त पाया गया था। 16 फरवरी 2008 को तीस हजारी कोर्ट के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट अजय गर्ग द्वारा उसे ‘घोषित अपराधी’ करार दिया गया था। आरोपी सजा से बचने के लिए पिछले 18 सालों से न्यायिक प्रक्रिया को ठेंगा दिखा रहा था।

डीसीपी ने बताया कि आरोपी अरविंद का पुराना आपराधिक इतिहास रहा है। वह साल 1999 में सिविल लाइंस थाने में डकैती की योजना बनाने और आर्म्स एक्ट के मामले में शामिल रहा है। इसके अलावा, साल 2000 में विवेक विहार थाने में दर्ज एक अन्य आपराधिक मामले में भी उसकी संलिप्तता रही है। पुलिस अब आरोपी से पूछताछ कर रही है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि फरारी के दौरान उसने किसी अन्य आपराधिक गतिविधि को अंजाम तो नहीं दिया।

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