पत्रकारिता की गिरती साख और वैश्विक चुनौतियों पर दिल्ली में महामंथन: पड़ोसी देशों की विभूतियां ‘बोधिसत्व अंतर्राष्ट्रीय सम्मान’ से विभूषित

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित हंसराज कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के संगोष्ठी कक्ष में मंगलवार को पत्रकारिता के बदलते स्वरूप और उसकी नैतिक जिम्मेदारी पर एक अंतरराष्ट्रीय विमर्श का आयोजन किया गया। संत शेर सिंह रिसर्च एंड एजुकेशनल ट्रस्ट और सार्क जर्नलिस्ट फोरम (इंडिया चैप्टर) द्वारा आयोजित इस गरिमामय समारोह में “बोधिसत्व अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता सम्मान-2026” का वितरण किया गया। इस कार्यक्रम की विशिष्टता यह रही कि इसमें न केवल भारत, बल्कि नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों के उन पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य और साहस का साथ नहीं छोड़ा।

कार्यक्रम के मुख्य सूत्रधार और ट्रस्ट के चेयरमैन प्रो. हंसराज सुमन ने अपने संबोधन में भारतीय मीडिया के वर्तमान परिदृश्य पर गहरा प्रहार किया। उन्होंने वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक का हवाला देते हुए कहा कि 180 देशों में भारत का 151वें स्थान पर खिसक जाना एक गंभीर चेतावनी है। प्रो. सुमन ने कहा, “आज की पत्रकारिता ‘छद्म जाल’ और कॉर्पोरेट हितों की बेड़ियों में जकड़ गई है। पत्रकारिता तभी सार्थक है जब वह निडर होकर सत्ता और व्यवस्था से कड़े सवाल पूछे।” उन्होंने युवाओं और पत्रकारों को डिजिटल क्रांति का लाभ उठाने की सलाह देते हुए कहा कि आज सोशल मीडिया के माध्यम से स्वतंत्र और यथार्थ पत्रकारिता के नए द्वार खुले हैं, जहाँ आर्थिक स्वावलंबन के साथ-साथ सत्य की स्थापना भी संभव है।

प्रो. सुमन ने भगवान बुद्ध के ‘बोधिसत्व’ विचार को पत्रकारिता से जोड़ते हुए कहा कि बुद्ध शांति, समानता और बंधुत्व के प्रतीक हैं। जिस प्रकार बुद्ध के विचारों ने सीमाओं को पार कर पूरे विश्व को एक नई दिशा दी, उसी प्रकार पत्रकारों को भी सीमाओं और विचारधाराओं से ऊपर उठकर मानवता के कल्याण के लिए लिखना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि निडर लेखन ही वह आधार है जो एक पत्रकार को विश्व स्तरीय प्रतिष्ठा दिलाता है और बड़े मीडिया हाउस भी अंततः ऐसे ही व्यक्तित्वों की तलाश करते हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. के.पी. सिंह ने अपने ओजस्वी भाषण में भारतीय उपमहाद्वीप की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक एकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने सिल्क रूट का उदाहरण देते हुए कहा कि यूनान से लेकर इंडोनेशिया तक हमारी जड़ें एक ही संस्कृति से जुड़ी हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि भले ही आज हम अलग-अलग देशों की सीमाओं में बंधे हों, लेकिन हमारा खान-पान, रहन-सहन और चिंतन आज भी एक है। उन्होंने पड़ोसी देशों के पत्रकारों के सम्मान को इसी सांस्कृतिक डोर को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम बताया।

इस अवसर पर नेपाल से आए दीपेंद्र प्रजापति, शैलेश साहू कनु, अविनाश कुमार गुप्ता, रुद्र सुबुद्धि और श्रीलंका से राहुल सामंत व यूएसपी भंडारा को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए शील्ड और प्रशस्ति पत्र देकर नवाजा गया। भारत की ओर से वरिष्ठ पत्रकार अश्वनी कुमार और न्यूज़ एंकर पूजा मोहन पांडे को भी यह सम्मान मिला। पूजा पांडे ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि पत्रकारिता चुनौतियों से भरा मार्ग है, लेकिन समाज की बुराइयों को उजागर करना ही इसका असली धर्म है।

हंसराज कॉलेज की प्राचार्या प्रो. रमा ने अपने संदेश में खबरों की विश्वसनीयता को लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति बताया। सार्क जर्नलिस्ट फोरम के इंडिया चैप्टर के अध्यक्ष डॉ. अनिरुद्ध ने अतिथियों का पारंपरिक तरीके से पगड़ी और अंगवस्त्र पहनाकर स्वागत किया। डॉ. लवकुश के कुशल संचालन और डॉ. अनिरुद्ध के धन्यवाद ज्ञापन के साथ इस सफल समारोह का समापन हुआ। कार्यक्रम में डॉ. सुरेंद्र सिंह, डॉ. जयंत कुमार, घनश्याम भारती और बड़ी संख्या में शिक्षकों व शोधार्थियों की उपस्थिति ने चर्चा के स्तर को और ऊंचा बना दिया।

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