दिल्ली में हुआ निरंकारी सामूहिक शादियों का आयोजन, 18 नवयुगल परिणय सूत्र में बंधे

नई दिल्ली: सादगी और आध्यात्मिक शिक्षाओं से सुसज्जित निरंकारी सामूहिक शादियों का आयोजन बुराड़ी प्रेम और आनंद के भाव संग संपन्न हुआ। इस अवसर पर भारत के विभिन्न राज्यों जैसे बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के साथ-साथ अमेरिका जैसे दूरस्थ देशों से आए लगभग 18 नवयुगल सतगुरु माता जी की स्नेहमयी छत्रछाया में परिणय सूत्र में बंधे और उन्होंने अपने मंगलमय दांपत्य जीवन हेतु आशीर्वाद प्राप्त किया। यह आयोजन केवल विवाह का उत्सव नहीं, अपितु सादगी, समर्पण और सौहार्द की एक ऐसी प्रेरणादायक मिसाल बना, जिसने वहां उपस्थित हर जनमानस को आनंद और श्रद्धा से सराबोर कर दिया।

इस शुभ अवसर पर निरंकारी मिशन के अधिकारीगण, वर-वधू के माता-पिता, सगे-संबंधी एवं अनेक श्रद्धालु भक्तों ने अपनी उपस्थिति से इस कार्यक्रम को गरिमामय बना दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक जयमाला एवं निरंकारी शादी के विशेष सूचक ‘सांझा-हार’ के आदान-प्रदान से हुआ।

जब नव विवाहित युगलों पर सतगुरु माता, निरंकारी राजपिता एवं वहां उपस्थित श्रद्धालुओं द्वारा पुष्प-वर्षा की गई, तो पूरा वातावरण आनंद और आध्यात्मिक प्रेम से गूंज उठा। निसंदेह यह केवल विवाह का आयोजन नहीं, बल्कि संतुलित और प्रेमपूर्ण जीवन की ओर एक दिव्य मार्गदर्शन था, जो हर हृदय को निर्मलता और पवित्रता से भर गया।

संत निरंकारी मंडल के सचिव, जोगिंदर सुखीजा ने जानकारी देते हुए कहा कि समाज कल्याण विभाग द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित यह निरंकारी सामूहिक विवाह समारोह मात्र एक आयोजन नहीं, बल्कि विविधता में एकता, सादगी और समरूपता की अनुपम मिसाल है। यह शुभ अवसर जाति, धर्म, भाषा और सामाजिक भेदभाव से परे प्रेम, समर्पण और समानता का दिव्य संदेश प्रसारित करता है।

नवविवाहित जोड़ों को आशीर्वाद देते हुए सतगुरु माता ने अपने अमृतमय वचनों में कहा कि सर्वप्रथम, यह समझना आवश्यक है कि सबसे ऊंचा सत्कार वही होता है, जब हम अपने जीवन में इस निरंकार और संत भाव को स्थान देते हैं। जीवन एक सुंदर यात्रा है, जिसे प्रेम, समर्पण और आपसी समझ से संवारा जाता है। विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है, जहां दोनों जीवनसाथी एक-दूसरे का हर परिस्थिति में साथ निभाते हैं।

जीवन के किसी मोड़ पर यदि एक साथी सेवा, सत्संग या सुमिरन में थोड़ी शिथिलता महसूस करे, तो दूसरे का यह दायित्व बनता है कि वह उसे प्रेमपूर्वक प्रेरित करते हुए उसे पुनः निरंकार की ओर उन्मुख करे। यह बंधन केवल आज, एक दिन या किसी विशेष अवसर के लिए नहीं, अपितु जीवनभर, हर क्षण निभाने का एक दिव्य संकल्प है। यह केवल दो हृदयों का नहीं, अपितु दो आत्माओं का भी मिलन है, जो सच्चे प्रेम और समर्पण से और अधिक प्रगाढ़ होता जाता है।

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