दिल्ली विश्वविद्यालय में अभाविप का ‘छात्र अधिकार मार्च’, 12 सूत्रीय मांगों को लेकर छात्रों का प्रदर्शन

नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों की समस्याओं और अधिकारों को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद दिल्ली ने मंगलवार को विश्वविद्यालय परिसर में विशाल ‘छात्र अधिकार मार्च’ निकाला। आर्ट्स फैकल्टी से शुरू हुए इस प्रदर्शन में डीयू के विभिन्न कॉलेजों से आए हजारों छात्र-छात्राएं शामिल हुए। अभाविप ने प्रशासन के समक्ष 12 प्रमुख मांगें रखीं और चेतावनी दी कि यदि इन पर तत्काल कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को और उग्र किया जाएगा।

प्रदर्शन के दौरान अभाविप ने विश्वविद्यालय प्रशासन से पोर्टा केबिनों को हटाने और परिसर में अनिवार्य फायर सेफ्टी ऑडिट कराने की पुरजोर मांग की। अभाविप का कहना है कि शैक्षणिक बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करने के लिए यह कदम अनिवार्य है। इसके अलावा, छात्रों ने 30 अप्रैल तक परीक्षा फॉर्म भरने पर लेट फीस से पूरी तरह छूट देने, पांच वर्षीय लॉ कोर्स की फीस कम करने और अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए सप्लीमेंट्री परीक्षा आयोजित करने की मांग उठाई।

अभाविप की मांगों में सामाजिक समावेशिता को भी प्रमुख स्थान दिया गया है। परिषद ने थर्ड जेंडर के छात्रों के लिए मुफ्त शिक्षा और विश्वविद्यालय के पूरे बुनियादी ढांचे को ‘दिव्यांग सुगम्य’ बनाने की मांग की है। साथ ही, शैक्षणिक गुणवत्ता सुधारने के लिए ‘एक कोर्स, एक फीस’ की नीति लागू करने और अकादमिक काउंसिल में छात्रों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का आह्वान किया गया है। इसके अलावा, कॉलेज कैंटीन में भोजन की गुणवत्ता और स्वच्छता को लेकर भी प्रशासन को कड़ी चेतावनी दी गई है।

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अभाविप दिल्ली प्रांत मंत्री सार्थक शर्मा ने कहा कि आज का यह मार्च डीयू प्रशासन की उदासीनता के विरुद्ध एक निर्णायक शंखनाद है। उन्होंने कहा, “हमारी 12 मांगें केवल सुझाव नहीं, बल्कि छात्रों की सुरक्षा और भविष्य के लिए अनिवार्य सुधार हैं। यदि प्रशासन ने इन पर तत्काल सकारात्मक कदम नहीं उठाए, तो हम इससे भी बड़ा आंदोलन करने के लिए विवश होंगे।”

प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने प्रशासन की कार्यशैली और ढिलाई के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। अभाविप का कहना है कि वे दिल्ली विश्वविद्यालय को एक सुरक्षित, समावेशी और छात्र-केंद्रित शैक्षणिक केंद्र बनाने के संकल्प से पीछे नहीं हटेंगे। प्रदर्शन के अंत में विश्वविद्यालय प्रशासन को एक ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें सभी मांगों को एक निश्चित समय सीमा के भीतर पूरा करने की अपेक्षा की गई है।

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