Sabarimala क्यों बना टकराव का मैदान? क्या अब अदालत तय करेगी धार्मिक नियम?

सबरीमला विवाद एक बार फिर देश की संवैधानिक बहस के केंद्र में है, लेकिन इसे केवल एक मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के सवाल तक सीमित करना एक गंभीर बौद्धिक भूल होगी। सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की पीठ जिस मसले पर सुनवाई कर रही है, वह असल में भारत के पूरे धार्मिक ढांचे, अधिकारों और न्यायिक सीमाओं की जड़ को हिला देने वाला प्रश्न है। यह केवल आस्था बनाम समानता की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह तय करने का क्षण है कि संविधान और परंपरा के बीच अंतिम शब्द किसका होगा।

सबसे अहम बात यह है कि यह पीठ केवल सबरीमला के प्रवेश विवाद पर सुनवाई नहीं कर रही है। यह उससे कहीं बड़ा मामला है। यहां टकराव है अनुच्छेद 25 और 26 के बीच। एक तरफ व्यक्ति का पूजा करने का अधिकार है, दूसरी तरफ धार्मिक समुदाय का अपने नियम तय करने का अधिकार है। सवाल यह है कि क्या कोई व्यक्ति किसी परंपरा को बदलने के लिए अदालत का सहारा ले सकता है? अगर ऐसा होता है तो फिर हर परंपरा अदालत के दरवाजे पर खड़ी होगी।

संवैधानिक नैतिकता का सवाल भी इस बहस का केंद्र है। पिछले फैसलों में इस अवधारणा का इस्तेमाल कर कई परंपराओं को चुनौती दी गई। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह एक खुला हथियार बन गया है, जिसके जरिए न्यायालय हजारों साल पुरानी परंपराओं को आधुनिक नजरिए से काट सकता है। क्या न्यायपालिका को इतनी खुली छूट दी जा सकती है? यह सवाल अब सबके सामने है।

एक और विस्फोटक मुद्दा है तथाकथित आवश्यक धार्मिक प्रथा की जांच। क्या न्यायालय यह तय करेगा कि कौन सी परंपरा धर्म का मूल हिस्सा है और कौन नहीं? क्या कानून के जानकार न्यायाधीश धर्म के निर्णायक बन सकते हैं? केंद्र सरकार भी इस पर सवाल उठा चुकी है कि अदालत पुजारी की भूमिका नहीं निभा सकती।

सरकार के हस्तक्षेप की सीमा भी इसी बहस में उलझी हुई है। अगर हर धार्मिक प्रथा को समानता के पैमाने पर कसा जाएगा तो क्या देश की हर परंपरा एक झटके में अवैध हो जाएगी? देखा जाये तो यह डर बेबुनियाद नहीं है। यही कारण है कि यह सुनवाई केवल एक मंदिर का मामला नहीं बल्कि पूरे धार्मिक ढांचे का भविष्य तय कर सकती है।

धार्मिक संप्रदाय की परिभाषा भी इस विवाद का अहम हिस्सा है। हिंदू धर्म की प्रकृति लचीली और बहुआयामी है। इसे किसी एक ढांचे में बांधना खुद इसकी आत्मा के खिलाफ है। फिर भी अदालत को यह तय करना है कि कौन-सा समूह एक अलग संप्रदाय माना जाएगा और कौन नहीं।

हम आपको बता दें कि साल 2018 का फैसला इस पूरे विवाद की जड़ में है। उस समय अदालत ने महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक ठहराया था। इसे समानता और गरिमा की जीत बताया गया। लेकिन दूसरी तरफ इसे धार्मिक परंपरा में हस्तक्षेप के रूप में भी देखा गया। यह दरार आज तक भरी नहीं है।

देखा जाये तो सबरीमला की परंपरा को समझे बिना इस विवाद पर राय देना दरअसल आधा सच बोलना है। यहां की यात्रा कोई सामान्य दर्शन नहीं बल्कि 41 दिन के कठोर व्रत से शुरू होती है, जिसमें साधक को ब्रह्मचर्य का पालन, सात्विक भोजन, दिन में दो बार स्नान, जमीन पर सोना, काले या भगवा वस्त्र पहनना और हर व्यक्ति में भगवान अयप्पा का स्वरूप देखना अनिवार्य होता है। यह पूरी साधना मन और शरीर को एक विशेष अवस्था में ले जाने की प्रक्रिया मानी जाती है। इसी संदर्भ में भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है और परंपरा के अनुसार प्रजनन आयु की महिलाओं का प्रवेश इस विशेष साधना व्यवस्था के विपरीत समझा गया। समर्थकों का तर्क है कि यह प्रतिबंध स्त्री विरोध नहीं बल्कि उस विशिष्ट धार्मिक अनुशासन और देवता के स्वरूप के सम्मान से जुड़ा है, जहां साधक और देव दोनों ब्रह्मचर्य के एक ही नियम में बंधे माने जाते हैं।

हम आपको यह भी याद दिला दें कि 2018 के फैसले के बाद जब पुनर्विचार याचिकाएं आईं, तो अदालत ने मामला खत्म करने की बजाय इसे और बड़ी पीठ को सौंप दिया था। यह कदम बताता है कि समस्या कहीं गहरी है। अदालत खुद यह समझ चुकी थी कि यह केवल एक फैसले से सुलझने वाला मुद्दा नहीं है। देखा जाये तो अब फैसला केवल यह नहीं होगा कि कौन मंदिर में जा सकता है, बल्कि यह तय होगा कि भारत में धर्म और संविधान के बीच अंतिम सीमा रेखा कहां खींची जाएगी।

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