सबरीमला विवाद एक बार फिर देश की संवैधानिक बहस के केंद्र में है, लेकिन इसे केवल एक मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के सवाल तक सीमित करना एक गंभीर बौद्धिक भूल होगी। सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों की पीठ जिस मसले पर सुनवाई कर रही है, वह असल में भारत के पूरे धार्मिक ढांचे, अधिकारों और न्यायिक सीमाओं की जड़ को हिला देने वाला प्रश्न है। यह केवल आस्था बनाम समानता की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह तय करने का क्षण है कि संविधान और परंपरा के बीच अंतिम शब्द किसका होगा।
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