यूपी के शहरी क्षेत्रों में विकास का रास्ता साफ, स्टांप शुल्क को लेकर ये अनिवार्यता खत्म

शहरी क्षेत्रों के विकास का रास्ता साफ हो गया है। योगी सरकार ने शहरी क्षेत्रों के विकास के लिए नगर निकायों व विकास प्राधिकरणों को स्टांप शुल्क का दो फीसदी दिए जाने के लिए छह-छह माह पर किस्तें देने का फैसला किया है।
इसके साथ ही अगली किस्त के लिए उपयोगिता प्रमाण पत्र की अनिवार्यता समाप्त दी गई है। इससे स्टांप शुल्क का 1327 करोड़ रुपये मिलने का रास्ता साफ हो गया है। अभी तक उपयोगिता प्रमाण पत्र मिलने के बाद दूसरी किस्त देने की व्यवस्था थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई कैबिनेट की बैठक में यह फैसला हुआ।

स्टांप एवं पंजीयन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) रविंद्र जायसवाल ने कैबिनेट फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि शहरों में अचल संपत्ति के अंतरण पर वसूले जाने वाले दो प्रतिशत अतिरिक्त स्टांप शुल्क की राशि के वितरण की प्रक्रिया में संशोधन कर दिया गया है। नई व्यवस्था लागू होने से 10 फरवरी 2026 तक की स्थिति के अनुसार लगभग 1327 करोड़ रुपये की धनराशि नगर निकायों और विकास प्राधिकरणों को बिना अतिरिक्त उपयोगिता प्रमाण पत्र के जारी की जा सकेगी। अतिरिक्त स्टांप शुल्क नगर निकायों, डेडिकेटेड अर्बन ट्रांसपोर्ट फंड, विकास प्राधिकरणों, विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरणों तथा उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद को दिया जाता है।

उन्होंने बताया कि भुगतान की व्यवस्था में बदलाव करते हुए तिमाही भुगतान की जगह अर्धवार्षिक (छमाही) भुगतान प्रणाली लागू की जाएगी। भुगतान साल में दो बार किया जाएगा और इसकी गणना वित्तीय वर्ष 2024-25 की पहली छमाही से की जाएगी। साथ ही वित्तीय वर्ष 2024-25 की दूसरी छमाही (अक्तूबर 2024 से मार्च 2025) की अवशेष धनराशि का भुगतान संबंधित प्रशासनिक विभाग की संस्तुति पर बिना अतिरिक्त उपयोगिता प्रमाण पत्र के जारी किया जाएगा।

नई व्यवस्था में यह भी प्रावधान किया गया है कि किसी भी वित्तीय वर्ष की पहली छमाही की धनराशि का भुगतान तभी किया जाएगा, जब पिछले वित्तीय वर्ष की पहली छमाही का उपयोगिता प्रमाण पत्र उपलब्ध करा दिया गया हो। इसी प्रकार दूसरी छमाही का भुगतान भी पिछली दूसरी छमाही के उपयोगिता प्रमाण पत्र के आधार पर किया जाएगा। त्रैमासिक भुगतान प्रणाली में उपयोगिता प्रमाण पत्र प्राप्त होने में देरी के कारण व्यवहारिक कठिनाइयां सामने आ रही थीं। इन समस्याओं को देखते हुए महानिरीक्षक निबंधन के प्रस्ताव पर भुगतान व्यवस्था को अर्धवार्षिक किया गया है।

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