केंद्रीय कृषि अध्यादेश-2020 क्या किसानों को गुलामी और बंधुआ मजदूर की ओर करेगा अग्रसर?

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आधिकारिक बयान के अनुसार , “कृषि उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सुविधा) अध्‍यादेश 2020 को अधिसूचित किया गया है. इसके तहत किसान अपनी पसंद के बाजार में उपज बेच पाएंगे. … जिससे कृषि व्यवसाय से जुड़ी कंपनियां, प्रोसेसर, थोक व्यापारी और निर्यातकों और किसानों के बीच पहले से तय कीमतों पर समझौते की छूट होगी.
सरकारी परिभाषा आपको अच्छी लगी होगी लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ नहीं, मानो यह अध्यादेश किसानों के लिए ख्याली पकवान के समान है हम और आप सायद उस स्थिति से नही समझ पाएंगे क्योंकि ना हम किसान है ना सायद आप, जिसका हक छीना जाता उसे इस दर्द का भलि भाँति अनुभव होता है और इतिहास गवाह है की किसानो के लिए हमेशा अपनी सुविधा अनुसार नियम कानून बनाए चाहे वो खाद बीज़ लेनी की प्रक्रिया हो या ऋण लेने की किसान हमेशा ही हताश हुआ है
राष्ट्रीय किसान महासंघ
संगठन ने कहा कि इन अध्यादेशों के जरिये आने वाले समय में केंद्र सरकार किसानों को मिलने वाले MSP को खत्म करने जा रही है। केंद्र सरकार का दावा है कि इन अध्यादेशों के किसानों को फायदा होगा लेकिन असल में किसानों को नहीं बल्कि बड़ी-बड़ी कम्पनियों को फायदा होगा..!
आज़ादी के बाद भुखमरी से जूझते भारत में खाद्य उत्पादन वर्ष-1960 के 5 करोड़ टन से बढ़कर वर्ष-2020 में 30 करोड़ टन से ज्यादा हो गया. इससे भारत कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भर और प्रमुख कृषि निर्यातक देश भी बन गया. इसका श्रेय जाता हरित क्रांति की उन्नत कृषि तकनीक (बौनी/संकर अनाज की किस्में, खाद आदि),मेहनतकश किसान और दूरदर्शी कृषि सुधार को जाता है, जिससे बिजली, पानी, बीज,खाद, अनाज फसलों की लाभकारी समर्थन मूल्य पर बिक्री और विपणन, भंडारण, वितरण व्यवस्था की सुविधा किसानों और गरीबों को मिली.
इन नीतिगत और ढांचागत सुधारों से हुई कृषि प्रगति के कारण, पिछले 50 वर्षो में कई बार सूखा और दूसरी आपदा आने के बावजूद, देश में कभी अकाल की स्थिति नहीं आयी. वर्तमान कोरोना आपदा और लाकडाउन में जब देश के सभी व्यावसायिक क्षेत्र को बंद करना पड़ा, तब भी देश के भंडार अनाज से भरे हुए है और देश के किसी प्रदेश से खाद्य पदार्थो के कमी से भुखमरी के हालात नहीं बने.
अर्थात देश को किसानो ने भूखे नहीं मरने दिया इतनी बड़ी आपदा में आज उनकी हालत का जिम्मेदार कौन हैं.!
  हाँ सरकार है……..!
वहीं पिछले 30 साल से वैश्विकरण, उदारीकरण और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के नाम पर, सरकार ने किसान से कुल लागत (सी-2 लागत) से कम पर अनाज खरीद कर किसान का खुला आर्थिक शोषण किया जो वार्षिक 3-4 लाख करोड़ रुपये यानी 8-10 हज़ार रुपये प्रति एकड़ वार्षिक बनता है. जहां सरकार ने आवश्यक खाद्य पदार्थो के दाम कम रखने का सारा बोझ किसान पर डाल दिया. वहीं दूसरी और सरकार ने समर्थन मूल्य कानून न बना कर बिचौलियों को भी किसान को लूटने की खुली छूट दी जो घोषित समर्थन मूल्य से कम पर खरीद करते है. जिसके प्रभाव से जब आज किसान को कृषि उत्पादन में कोई समस्या नहीं है लेकिन कृषि विपणन में लाभकारी मूल्य नहीं मिलने से किसान हताश है.
आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) की रिपोर्ट के अनुसार फसल बिक्री के कम मूल्य मिलने से, भारतीय किसानों को वर्ष 2000-2016 के बीच लगभग 45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. जिससे देश में समाजिक और आर्थिक असंतुलन पैदा हुआ और किसान की आर्थिक स्तिथि दूसरे व्यावसायिक वर्ग के मुकाबले दिन पर दिन गिरती चली गयी, किसान पर कर्ज बढ़ता चला गया और किसान हताशा में आत्महत्या पर मजबूर हुए.
सरकार के तमाम दावों के बावजूद कर्ज के बोझ तले दबे किसानो की आत्महत्याओं का सिलसिला आज तक रुका नहीं है. सरकार बिना नीतिगत और ढांचागत कृषि सुधार लागू किए, किसानों को खोखले नारों, कर्ज माफी, वर्ष-2022 तक किसानों की आय दुगनी करना, जीरो बजट खेती, सॉयल हेल्थ कार्ड, दूसरे राज्यों में कृषि उत्पाद की छूट,भंडारण सीमा खत्म करना आदि से लगातार बहकाती रही है …!
डॉ वीरेंद्र सिंह लाठर
पूर्व प्रधान वैज्ञानिक (आनुवंशिकी और साइटोजेनेटिक्स) के अनुसार ~
इसी कड़ी में सरकार ने कोरोना आपदा के 20 लाख करोड़ रुपये पैकेज में से किसानों को कुछ भी नहीं दिया और कृषि सुधार की घोषणा को किसान हितैषी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि देश के 90 प्रतिशत किसान 2 हेक्टर से कम पर खेती करते हैं. वो इन तथाकथित खोखले कृषि सुधारों का लाभ नहीं ले पाएंगे और इनका अनुचित लाभ केवल बिचोलिये और जमाखोर पूंजीपति उठाएंगे.
रिपोर्ट – धर्मेन्द्र कुशवाहा (डी. के.)

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