भारत-अमेरिका व्यापार समझौता पर वार्ता पूरी, कृषि क्षेत्र फिर बना अड़चन, अमेरिका ने भारत को बताया कठिन साझेदार

राष्ट्रीय जजमेंट

भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर बातचीत निर्णायक दौर में पहुंच चुकी है। वाशिंगटन में हाल ही में हुई उच्चस्तरीय वार्ताओं के बाद दोनों देशों ने संकेत दिए हैं कि अधिकांश मुद्दों पर सहमति बन चुकी है और अब केवल कुछ जटिल विषयों पर अंतिम समाधान बाकी है। भारत और अमेरिका के बीच यह समझौता आर्थिक संबंधों को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है। हालांकि अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर ने भारत को एक कठिन देश बताते हुए कहा कि भारतीय कृषि क्षेत्र लंबे समय से संरक्षित रहा है, जिससे बातचीत में चुनौतियां आती हैं। उन्होंने अमेरिकी संसद की समिति के समक्ष कहा कि भारत अपने कृषि बाजारों को खोलने में सतर्क है, हालांकि कुछ क्षेत्रों में सहमति की संभावना भी दिखाई दे रही है। खास तौर पर पशु आहार में उपयोग होने वाले उत्पादों जैसे डीडीजीएस पर बातचीत जारी है। इस वार्ता में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वाणिज्य विभाग के अतिरिक्त सचिव दर्पण जैन ने किया जबकि अमेरिकी पक्ष का नेतृत्व ब्रेंडन लिंच के हाथ में रहा। तीन दिन तक चली इस बैठक में समझौते के बारीक पहलुओं पर चर्चा की गई। हम आपको याद दिला दें कि दोनों देशों ने इस वर्ष फरवरी में समझौते का प्रारूप जारी किया था, जिसमें पारस्परिक लाभ और व्यापार विस्तार पर जोर दिया गया था। भारत इस समझौते के तहत अमेरिकी बाजार में विशेष पहुंच चाहता है। दोनों देशों का लक्ष्य वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को पांच सौ अरब डॉलर तक पहुंचाना है। इस दिशा में शुल्क में कमी एक प्रमुख मुद्दा है। अमेरिका ने पहले भारतीय उत्पादों पर लगाए गए ऊंचे शुल्क को घटाने पर सहमति जताई थी, जिससे व्यापार को गति मिल सकती है। इस बीच, अमेरिकी नीतियों में आए बदलावों ने भी इस समझौते को प्रभावित किया है। अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए पारस्परिक शुल्क यानि टैरिफ को असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद भारत अब नए वैश्विक शुल्क ढांचे के अनुसार समझौते में संशोधन करने की कोशिश कर रहा है, ताकि उसके हित सुरक्षित रह सकें। हम आपको यह भी बता दें कि व्यापार वार्ता के समानांतर एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका ने उन शुल्कों को वापस करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है जो पहले आपातकालीन कानून के तहत लगाए गए थे। इसके लिए सीबीपी ने एक नया ऑनलाइन मंच शुरू किया है, जिससे कंपनियां अपने दावों को दर्ज कर सकती हैं। अनुमान है कि कुल वापसी राशि में से दस से बारह अरब डॉलर भारतीय वस्तुओं से जुड़ा हुआ है। यह वापसी मुख्य रूप से वस्त्र, इंजीनियरिंग उत्पाद और रसायन क्षेत्रों से संबंधित है, जिन्हें पिछले वर्ष भारी शुल्क का सामना करना पड़ा था। हालांकि एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इन रकम का सीधा लाभ भारतीय कंपनियों को नहीं मिलेगा, क्योंकि दावा केवल अमेरिकी आयातक ही कर सकते हैं। ऐसे में भारतीय निर्यातकों को अपने अमेरिकी साझेदारों के साथ समझौते कर लाभ साझा करना होगा।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारतीय कंपनियां रणनीतिक तरीके से बातचीत करें, तो वह इस स्थिति को अपने पक्ष में बदल सकती हैं। वह कीमतों में संशोधन, नए व्यापारिक समझौते और भविष्य के ऑर्डर के जरिए लाभ प्राप्त कर सकती हैं। इससे न केवल उनके मुनाफे में सुधार होगा बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में उनकी स्थिति भी मजबूत होगी।वहीं, एक अलग विवादित बयान ने भी भारत अमेरिका संबंधों पर चर्चा को प्रभावित किया है। राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा भारत सहित कई देशों के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया गया है जिसकी काफी आलोचना हो रही है। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। अमेरिकी अधिकारियों ने इसे उपयोगी और रचनात्मक बताया है, जबकि भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि समझौते का पहला चरण लगभग तैयार है।विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह समझौता सफलतापूर्वक पूरा हो जाता है, तो यह वैश्विक व्यापार परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बदलाव साबित होगा। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के बीच यह साझेदारी न केवल व्यापार को बढ़ावा देगी बल्कि रणनीतिक सहयोग को भी मजबूत करेगी।बहरहाल, भारत को एक ओर अपने संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा करनी है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी भी बढ़ानी है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि दोनों देश किस तरह संतुलन बनाकर इस ऐतिहासिक समझौते को अंतिम रूप देते हैं।

Comments are closed.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More