दूर का युद्ध, नज़दीक का संकट: भारत और तेल की चुनौती

हॉर्मुज़ पर खतरा, भारत की अर्थव्यवस्था पर मंडराता दबाव

राष्ट्रीय जजमेंट

दुनिया के नक्शे पर भले ही पश्चिम एशिया भारत से हजारों किलोमीटर दूर हो, लेकिन वहाँ उठती युद्ध की लपटें भारत की अर्थव्यवस्था तक पहुँचने में देर नहीं लगातीं। आज जब हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास तनाव बढ़ रहा है और ईरान की ओर से गुजरने वाले तेल टैंकरों को निशाना बनाने की चेतावनियाँ सामने आ रही हैं, तब यह संकट केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह जाता। वैश्विक तेल व्यापार की जीवनरेखा माने जाने वाले इस समुद्री मार्ग में किसी भी प्रकार की बाधा का सीधा असर भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों पर पड़ सकता है।

ईरान की ओर से जहाज़ों को निशाना बनाने की चेतावनियाँ और बढ़ते युद्ध जोखिम के कारण अंतरराष्ट्रीय समुद्री बीमा कंपनियों की झिझक ने पहले ही इस मार्ग की स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। यदि हालात और बिगड़ते हैं तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाज़ार और अर्थव्यवस्था पर व्यापक दबाव पैदा करेगा।

ऊर्जा की धड़कन: क्यों महत्वपूर्ण है हॉर्मुज़

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा आपूर्ति का सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग माना जाता है। लगभग 33 किलोमीटर चौड़ा यह मार्ग प्रतिदिन करीब 2 करोड़ बैरल कच्चे तेल के परिवहन का माध्यम है, जो वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत है।

पश्चिम एशिया के प्रमुख तेल उत्पादक—सऊदी अरब, इराक, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात—से निकलने वाला अधिकांश तेल इसी मार्ग से एशिया और यूरोप तक पहुँचता है। यही कारण है कि इस जलडमरूमध्य को वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की “धड़कन” कहा जाता है।

यदि यह मार्ग किसी सैन्य टकराव, मिसाइल हमलों या समुद्री नाकेबंदी के कारण बाधित होता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति तत्काल प्रभावित हो सकती है।

भारत की ऊर्जा निर्भरता: संकट की संभावित मार

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता देश है और अपनी कुल आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत तेल आयात करता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में अस्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय बन जाती है।

हाल के वर्षों में भारत ने आयात स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में कदम उठाए हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद भारत ने रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि की है। वर्तमान में भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 30 से 35 प्रतिशत के बीच मानी जाती है।

इसके अलावा इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात भी भारत के प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता बने हुए हैं। लेकिन यदि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में गंभीर अवरोध उत्पन्न होता है, तो इन देशों से आने वाले तेल टैंकरों की आवाजाही भी प्रभावित हो सकती है।

तेल भंडार: कितने दिन तक सुरक्षित है भारत

संभावित ऊर्जा संकट से निपटने के लिए भारत ने रणनीतिक तेल भंडार विकसित किए हैं। इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व्स लिमिटेड के अंतर्गत तीन प्रमुख भंडार केंद्र—विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर—स्थापित किए गए हैं।

इन भंडारों में लगभग 5.3 मिलियन टन कच्चा तेल संग्रहीत किया जा सकता है, जो देश की लगभग 9–10 दिन की खपत के बराबर है। यदि सार्वजनिक और निजी तेल कंपनियों के वाणिज्यिक भंडार को भी इसमें जोड़ दिया जाए, तो भारत के पास कुल मिलाकर लगभग 65–70 दिनों की तेल आपूर्ति का सुरक्षा कवच माना जाता है।

हालाँकि यदि वैश्विक आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है तो यह भंडार भी स्थायी समाधान नहीं बन सकता।

रूस का विकल्प और अमेरिकी दबाव

ऊर्जा सुरक्षा के प्रश्न पर भारत ने अब तक संतुलित और व्यावहारिक नीति अपनाई है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रूस से तेल आयात जारी रखा है। इस मामले में अमेरिका और यूरोपीय देशों की ओर से कई बार अप्रत्यक्ष दबाव देखने को मिला है।

यदि पश्चिम एशिया में संकट गहराता है तो रूस भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण विकल्प बना रह सकता है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को प्राथमिकता देते हुए अंतरराष्ट्रीय दबावों से परे स्वतंत्र निर्णय लेने की रणनीतिक क्षमता बनाए रखता है।

तेल की कीमतों में संभावित उछाल

यदि हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में वास्तविक अवरोध उत्पन्न होता है, तो वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ उछाल आ सकता है। कई ऊर्जा विश्लेषकों के अनुसार ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच सकती है।

ऐसी स्थिति में भारत में पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और परिवहन लागत बढ़ने की आशंका है। इसका सीधा असर महँगाई दर पर पड़ेगा और आर्थिक विकास की गति भी प्रभावित हो सकती है।

दूर की जंग, भारत के लिए चेतावनी

पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव यह याद दिलाता है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में कोई भी संकट सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। हजारों किलोमीटर दूर छिड़ी जंग भी भारत के बाजारों, उद्योगों और आम नागरिक की जेब तक असर डाल सकती है।

ऐसे समय में भारत के लिए आवश्यक है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करे, आयात स्रोतों में विविधता बढ़ाए और रणनीतिक भंडार का विस्तार करे। क्योंकि इतिहास बताता है कि युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते—उनकी कीमत अंततः पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाएँ चुकाती हैं।

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