हमें अल्लाह पर भरोसा… अब क्या बोल गए मदनी?

राष्ट्रीय जजमेंट

सुप्रीम कोर्ट ने हाल में चलन में आए बुलडोजर न्याय की तुलना अराजकता की स्थिति से की और देशभर के लिए दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा कि कारण बताओ नोटिस दिए बिना किसी भी संपत्ति को ध्वस्त नहीं किया जाए तथा प्रभावितों को जवाब देने के लिए 15 दिन का वक्त दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला अच्छा है. जब मध्यप्रदेश के अंदर बुलडोजर चला था, तब ये अचंभा हुआ था। तब हम कोर्ट में गए थे, यह जमीयत उलेमा हिंद की बड़ी उपलब्धि है।मौलाना मदनी ने कहा कि ये कुदरत का करिश्मा है। फैसले को गरीबों के हक में बताते हुए उन्होंने कहा कि इसमें हिंदू और मुसलमान दोनों के घर गिराए गए थे। लेकिन ये सच्चाई है कि 95 फीसदी मुसलमानों का घर गिराया गया। असम सरकार पूरे जगहों पर मुसलमानों का गांव गिरा देती है। 15 दिन का मौका मिलना चाहिए। हाई कोर्ट के अंदर मौका मिलता है हमें, चूंकि ये पूरे मुल्क का मसला था इसलिए हम सुप्रीम कोर्ट में गए।बता दें कि न्यायालय ने कहा कि प्राधिकारी उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना नागरिकों की संपत्ति को ध्वस्त करके उन्हें दंडित नहीं कर सकते। न्यायालय ने ऐसी ज्यादतियों को मनमाना करार दिया और कहा कि इससे सख्ती से निपटे जाने की जरूरत है। न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने एक इमारत को बुलडोजर से ध्वस्त करने और महिलाओं, बच्चों तथा वृद्ध व्यक्तियों को रातों-रात बेघर कर देने के दृश्य को भयावह करार दिया। पीठ ने अपने 95 पृष्ठ के फैसले में कहा कि यदि प्राधिकारी न्यायाधीश की तरह काम करते हैं और किसी नागरिक पर इस आधार पर मकान ढहाने का दंड लगाते है कि वह एक आरोपी है तो यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन है।

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