विभाजन की राजनीति से,जीत की राह चुनती भाजपा

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भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कहते हैं कि मुझे तो 2019 में कोई चुनौती नजर नहीं आती। विपक्ष जब सत्ता में था तो असफल था ही, विपक्ष के रूप में भी असफल है।
हमारे लिए सत्ता सेवा का अवसर है । हमने दिन रात कीर्तिमान कायम करके बिजली देने, किसानों की आय दुगनी करने, फसल बीमा, आयुष्मान भारत, स्वच्छ भारत, आदि द्वारा रिकॉर्ड बनाया है।
अमित शाह हमलावर होकर विपक्ष पर तंज कसते हैं कि विपक्ष अखलाक, अखलाक करता रहा वोट किसे मिले?
विपक्ष नोटबंदी को विनाशकारी और जीएसटी को गलत ढंग से लागू किया गया है कहता रहा, मानव अधिकार की बात करता रहा, अरबन नक्सल और बंगलादेश घुसपैठियों के सवाल पर चिल्लाता रहा, मगर जीतते हम है।
फेंक न्यूज गलत है लेकिन करना पड़ता है । विपक्ष ललित मोदी, विजय माल्या, नीरव मोदी, चौकसी, राफेल कहता रहे, मगर हमें आने वाले पचास साल तक सत्ता से हिलाने वाला कोई नहीं है ।
भारत के विपक्षी दल चिन्तित है और काट ढूंढ रहे हैं। सब थोड़ा दक्षिण पंथ की तरफ खिसक कर घोर-दक्षिणपंथी से लड़ने की सोच रहे हैं। राहुल कैलाश-मानसरोवर जाते हैं अपने को शिव भक्त घोषित करते हैं ।
किन्तु भारतीय जनता पार्टी के नोटबंदी, जी एस टी, साम्प्रदायिक व जाति गत बंटवारे, शोषण, उत्पीड़न के बावजूद भाजपा के अति आत्म विश्वास का तोड़ निकालने में वे अभी तक अपना आत्म विश्वास संजो पाने में असमर्थ हैं ।
दूसरी बात भाजपा और आरएसएस के पास जनता के अलग-अलग हिस्सों के लिए परस्पर विरोधी बातें कहने और उसे विश्वसनीय ढंग से मनवा लेनी की कला है। विपक्ष के पास इसका तोड़ नहीं है।
अभी हाल में मोहन भागवत ने एक सम्बोधन में मुसलमानों के बिना भारत का कोई अथ॔ नहीं, मुक्त भारत की जगह युक्त भारत, स्वतंत्रता आन्दोलन में कांग्रेस का योगदान आदि बाते कही।
यह प्रचार का एक ऐसा औजार हैं जिससे भ्रमित होकर देश के बुद्धिजीवी यह सोचने लगेंगे कि 90 साल पुराना आर एस एस अपनी छवि बदल रहा है।
2019 के चुनाव के लिए पक्ष विपक्ष मनथर गति से अपनी अपनी ढपलियां बजानी शुरू कर दी है । वैसे इन दलों का असली राग मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना मणिपुर के चुनाव नतीजों के बाद ही जोर दार ढंग से सुनाई देगा ।
सभी जानते हैं कि चुनाव राजनैतिक सरगरमी में अराजनैतिक व तटस्थ लोगों को भी कोई न कोई पक्ष लेने को विवश करने का भंवर बनाता है।
इस समय जबकि एक खास व्यक्ति (मोदी) और समुची पार्टी (भाजपा) जिसका एजेंडा हीं हर समय चुनाव रहा है और जिसने सफलता से इस चुनौती को स्वीकार कर परिणाम दिया है।
असम से लेकर उत्तर प्रदेश तक , और जिसके चुनावी दस्ते काफी शक्तिशाली हो चुके हैं उसकी और विपक्ष की चुनौतियां क्या और किस तरह की होगी?
भाजपा एक ही सांस में कई धरातलो अपील करती रही हैं कि विकास और परिवर्तन हिन्दुत्व और अंध-राष्ट्रीयता आशा और भय। भाजपा नेताओं द्वारा जिस तरह के शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है उससे निश्चित है कि
उसका और अधिक संकीर्ण रूप सामने आना है । हालांकि सबका सबका साथ सबका विकास एक चुनावी नारा था, तथापि भाजपा अध्यक्ष के वक्तव्य के बाद वह भी पुरी तरह अप्रासंगिक हो गया है।

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जाहिर है कि भय और विभाजन की इस राजनीति से भाजपा जीत जाती है तो उसकी कीमत क्या होगी?
नरेश दीक्षित (संपादक समर विचार)

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