रैन बसेरों में दम तोड़ती इंसानियत, कबाड़ में पड़े कूलर, DUSIB की ठंडी फाइलों में गर्म ‘समर एक्शन प्लान’

नई दिल्ली: देश की राजधानी में पारा 45 डिग्री के करीब पहुँच रहा है, लेकिन दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (DUSIB) के रैन बसेरों में रहने वाले हजारों बेघरों के लिए यह केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन गया है। सेंटर फॉर होलिस्टिक डेवलपमेंट (CHD) के ताज़ा फील्ड सर्वे ने दिल्ली सरकार के ‘समर एक्शन प्लान 2026-27’ की उन परतों को उधेड़ कर रख दिया है, जिनके पीछे प्रशासनिक मुस्तैदी के दावे किए जा रहे थे। सर्वे के अनुसार, दिल्ली के 24 सबसे महत्वपूर्ण रैन बसेरों (जैसे सराय काले खां, जामा मस्जिद और बंगला साहिब) में कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। यहाँ लगभग 50% कूलर और पंखे केवल शोपीस बनकर रह गए हैं। लाहौरी गेट के रैन बसेरे की स्थिति तो यह है कि वहाँ 70% पंखे और 71% डेजर्ट कूलर कबाड़ में तब्दील हो चुके हैं। यह महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि आपराधिक अनदेखी है, जिसका नतीजा रैन बसेरों का सहारा लेते मजबूर बेघरों को भुगतना पड़ता है।

भीषण गर्मी में सबसे बुनियादी ज़रूरत पानी की होती है, लेकिन यहाँ भी स्थिति भयावह है। सर्वे किए गए 40% आश्रय स्थलों में स्थायी पानी का कनेक्शन तक नहीं है। जामा मस्जिद और बंगला साहिब में रहने वाले लोग पूरी तरह से पानी के टैंकरों के रहमों-करम पर हैं, जो मात्र 48 घंटे में एक बार आते हैं। सरकार के निर्देशानुसार हर केंद्र पर ओआरएस और प्राथमिक चिकित्सा किट होनी चाहिए थी, लेकिन मोरी गेट और दंगल मैदान जैसे व्यस्त केंद्रों पर एक भी पैकेट उपलब्ध नहीं था। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा यह है कि महिला आश्रय स्थलों में सैनिटरी पैड मशीनें खाली पड़ी हैं और सुरक्षा के लिए महिला गार्डों की तैनाती कागजों तक ही सीमित है।

रिपोर्ट में शामिल ‘विक्की’ (35 वर्ष) का मामला इस पूरे सिस्टम के ‘पॉलिसी पैराडॉक्स’ को उजागर करता है। बंगला साहिब रैन बसेरे से महज़ 50 मीटर की दूरी पर सांस के लिए तड़प रहे इस युवक को बचाने के लिए जब रेस्क्यू टीम ने कोशिश की, तो सरकारी तंत्र की असलियत सामने आई। एम्बुलेंस कर्मियों ने पुलिस की मौजूदगी के बिना मरीज़ को छूने तक से मना कर दिया, जिससे आपातकालीन उपचार के ‘गोल्डन ऑवर’ का गला घोंट दिया गया। सबसे चौंकाने वाला खुलासा तब हुआ जब DUSIB कंट्रोल रूम ने फोन पर यह स्वीकार किया कि उनके रेस्क्यू ऑपरेशन केवल 15 मार्च तक के लिए थे और अब वे अधिकृत नहीं हैं। यह बयान उस ‘समर एक्शन प्लान’ का सीधा उल्लंघन है, जो अप्रैल और मई की भीषण लू में बेघरों को सड़कों से उठाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने का वादा करता है।

यह पूरी कार्ययोजना दिल्ली उच्च न्यायालय के एक आदेश के बाद तैयार की गई थी, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि जनवरी-फरवरी में ही तैयारी पूरी कर ली जाए ताकि मई-जून की गर्मी में किसी की जान न जाए। DUSIB ने दावा किया था कि वह 197 रैन बसेरों के माध्यम से 17,000 से अधिक लोगों को सुरक्षित रखेगा और अस्पतालों के पास 13 अतिरिक्त केंद्र खोले जाएंगे। लेकिन जमीनी हकीकत बताती है कि जामा मस्जिद जैसे केंद्रों पर बिजली का इतना लोड है कि कूलर चलाने पर बार-बार ट्रिपिंग होती है। जब तक ये तकनीकी और प्रशासनिक खामियां दूर नहीं होतीं, तब तक ये रैन बसेरे ‘राहत’ के बजाय ‘यातना केंद्र’ बने रहेंगे।

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