सफदरजंग अस्पताल में सुरक्षा के नाम पर ‘किलेबंदी’, मरीजों और तीमारदारों की बढ़ी मुसीबत

सुरक्षा और सुविधा के बीच फंसीं मानवीय संवेदनाएं, 5 मिनट का सफर हुआ डेढ़ किलोमीटर का

नई दिल्ली: देश के प्रतिष्ठित सफदरजंग अस्पताल में रात के समय सुरक्षा के नाम पर गेटों को बंद किए जाने से मरीजों और उनके परिजनों की मुश्किलें चरम पर पहुँच गई हैं। अस्पताल प्रशासन द्वारा गेट नंबर 1, 2, 3 और 4 बंद करने के फैसले ने तीमारदारों को असहाय बना दिया है। सबसे बदतर स्थिति उन लोगों की है जो दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर बने अस्थाई रैन बसेरों में शरण लिए हुए हैं। अस्पताल के वार्डों व एम्स से रैन बसेरों तक पहुँचने का सीधा रास्ता बंद होने के कारण मरीज व तीमारदारों को करीब 1.5 किलोमीटर का लंबा चक्कर काटकर जाना पड़ रहा है, जो आपातकालीन स्थिति व रात के समय किसी बड़ी मुसीबत से कम नहीं है।

अस्पताल के इस नए नियम के विरुद्ध तीमारदारों का गुस्सा फूट पड़ा है। परिजनों का कहना है कि वार्ड के भीतर केवल एक अटेंडेंट को रुकने की अनुमति मिलती है, जिसके कारण बाहर रैन बसेरे में रुके अन्य परिजनों को दवाओं, भोजन और जरूरी सामान के लिए बार-बार अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

एक परेशान तीमारदार ने अपना दर्द साझा करते हुए बताया कि अस्पताल में एक मरीज के साथ केवल एक अटेंडेंट को रुकने की अनुमति मिलती है। ऐसे में बाहर रुके हुए परिजनों को जरूरी सामान या दवाओं के लिए बार-बार आना-जाना पड़ता है। उन्होंने सवाल उठाया कि “यह एक अस्पताल है, कम से कम आने-जाने के लिए गेट तो खुला रहना चाहिए।” रात के सन्नाटे में बुजुर्गों और महिलाओं के लिए सुनसान सड़कों पर लंबी दूरी तय करना सुरक्षा के लिहाज से भी खतरनाक साबित हो रहा है।

दूसरी ओर, सफदरजंग अस्पताल (VMMC) प्रशासन ने इस कदम को अनिवार्य प्रशासनिक सुधार बताया है। प्रशासन का तर्क है कि पूर्व में गेटों के खुले रहने से अस्पताल परिसर में नशा करने वालों और असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता था, जिससे स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा को खतरा था। प्रबंधन का दावा है कि गेट रेगुलेशन के बाद चोरी और अवैध गतिविधियों में 70 प्रतिशत तक की कमी आई है। साथ ही, बाहरी लोगों द्वारा शौचालयों के दुरुपयोग पर रोक लगने से परिसर के भीतर स्वच्छता और स्वच्छता मानकों में भी भारी सुधार देखने को मिला है।

विवाद के बीच, अस्पताल प्रबंधन ने स्पष्ट किया है कि आवाजाही पूरी तरह बंद नहीं की गई है। रिंग रोड पर स्थित सरोजिनी नायडू द्वार (गेट नंबर 5) सभी मरीजों और आगंतुकों के लिए 24 घंटे खुला रहता है। प्रशासन के अनुसार, यह निर्णय आंतरिक चर्चा और आम सहमति के बाद ही अस्पताल के सुचारू कामकाज और सुरक्षा के बड़े हित में लिया गया है। हालांकि, धरातल पर तीमारदारों की परेशानी को देखते हुए अब यह माँग उठने लगी है कि सुरक्षा और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन बनाने के लिए गेटों पर सीमित आवाजाही की व्यवस्था की जाए।

दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देश पर अस्पताल के बाहर अस्थाई रैन बसेरे इसलिए बनाए गए थे ताकि मरीजों के परिजनों को ठंड की रात में भटकना न पड़े। लेकिन ‘तालाबंदी’ ने इन मरीजों व परिजनों को चक्कर लगाते कर दिए हैं। रैन बसेरे से अस्पताल की जो दूरी महज 5 मिनट की थी, अब वह गेट बंद होने के कारण बीस से तीस मिनट के थकाऊ सफर में बदल गई है। सामाजिक कार्यकर्ताओं की मांग है कि रैन बसेरों के पास वाले किसी एक गेट पर सुरक्षाकर्मी तैनात कर सुरक्षा मानक के आधार पर प्रवेश दिया जाना चाहिए।

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