मैसूर राज परिवार की नवरात्रि पर अनोखी परंपरा: ‘वज्र मुष्टि कलागा’ लड़ाई, जो देश में और कहीं नहीं होती

राष्ट्रीय जजमेंट

मैसूर: पूरे देश में दशहरे का त्योहार धूमधाम से मनाया जा रहा है. कुछ जगहों पर खास परंपरा लंबे समय से चली आ रही है. कर्नाटक के मैसूर राजपरिवार द्वारा नवरात्रि पूजाओं में ‘वज्र मुष्टि कलागा’ की एक अनूठी परंपरा है. विजयादशमी के दिन, महल के कल्याण मंडप में तैयार लाल मिट्टी के अखाड़े में वज्र मुष्टि युद्ध का आयोजन किया जाता है. वज्र मुष्टि लड़ाई देश में कहीं और नहीं होती. मैसूर में यह परंपरा आज भी जारी है.वज्र मुष्टि युद्ध का इतिहास: नवरात्रि के समय जट्टी समुदाय द्वारा आयोजित वज्र मुष्टि युद्ध का इतिहास 400 से 500 वर्ष पुराना है. विजयनगर राजवंश के समय, जट्टी समुदाय गुजरात से राजपरिवारों द्वारा शासित क्षेत्रों में आकर बस गया था. उस समय, वे राजाओं के महलों में शरण लेते थे और कुश्ती लड़ते थे. कर्नाटक के मैसूर, बेंगलुरु, चामराजनगर और चन्नपटना क्षेत्रों में लगभग 10 से 12 हजार जट्टी हैं और वे अब विभिन्न प्रकार के व्यवसायों में लगे हुए हैं.जट्टियों का आहार: दशहरा से तीन महीने पहले वज्र मुष्टि कलगा का अभ्यास शुरू करने वाले जट्टियां अपने आहार में बहुत कड़े नियमों का पालन करते हैं. वे अपने दैनिक भोजन में मुख्य रूप से फल, दूध, अंडे और सूखे मेवे खाते हैं. पहले, महाराजा अपने महलों में जट्टियों को रखते थे. हालांकि, अब जट्ट कलगा नहीं होता, केवल परंपरा के लिए वज्र मुष्टि कलगा का आयोजन किया जाता है.क्या होता है इस युद्ध मेंः वज्र मुष्टि कलागा, मैसूर की एक पारंपरिक युद्ध कला है, जिसमें दो पहलवान (जिन्हें जेट्टी कहा जाता है) एक धातु के छोटे हथियार, जिसे ‘वज्र मुष्टि’ या ‘नक्कलडस्टर’ कहते हैं, का इस्तेमाल करके एक-दूसरे के सिर पर वार करते हैं और पहले खून निकालने वाला जीतता है. महल के अंदर तीसरी पूजा के बाद, महाराजा तलवार उठाते हैं. फिर बीच में एक व्यक्ति वज्र मुष्ठि लड़ाई का संकेत देता है.तुरंत, 30 सेकंड से 1 मिनट के भीतर 2 जट्टियों के बीच वज्र मुष्ठि लड़ाई होती है. लड़ाई तब समाप्त होती है जब जट्टी के सिर से वज्र मुष्ठि हथियार के साथ लड़ते हुए खून निकलता है. फिर शाही परिवार एक विजय मार्च पर निकलता है. बाद में, बन्नी पूजा आयोजित की जाती है.वज्र मुष्टि अस्त्र क्या है: यह एक छोटा, तेज धार वाला धातु का उपकरण होता है, जिसे पहलवान अपनी मुट्ठी में पहनते हैं. इसका शाब्दिक अर्थ ‘वज्र जैसी कठोर मुट्ठी’ होता है. हाथी दांत से बना होता है. प्राचीन काल में, चार अस्त्रों का प्रयोग होता था. हिरण का सींग, धातु की वज्र मुष्टि, लोहे की वज्र मुष्टि और काली लकड़ी की वज्र मुष्टि. अब इस्तेमाल होने वाले हाथी दांत के अस्त्र राजमहल द्वारा दिए जाते हैं और परंपरा के अनुसार उन्हें वापस कर दिए जाते हैं.परंपरा के लिए होता है युद्धः वज्र मुष्टि युद्ध में तीन बार हिस्सा ले चुके रघुनाथ जट्टी ने ईटीवी भारत को बताया, “वज्र मुष्टि युद्ध के लिए चुने गए जट्टियों का चयन उनकी ऊंचाई और वजन पर विचार किए बिना किया जाता है. वज्र मुष्टि युद्ध देवी चामुंडेश्वरी की कृपा से होती है. उस युद्ध में जो भी चोटें लगती हैं, वह सब देवी चामुंडेश्वरी की कृपा से होता है. अब वज्र मुष्टि युद्ध पहले की तरह नहीं होता है. यह केवल परंपरा के लिए आयोजित किया जाता है.”

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