हे “मी टू”……………..

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तुमने हमें रावण बना दिया
न रण था नहीं ही कोई प्रण था।
लेकिन जिंदगी का वह भी छण था ।
याद है न ?
जब हमने उधर देख कर सिर्फ मुस्करा ही दिया था
तुमने मुझे रावण बना दिया था।
वह पर स्त्री नहीं
मैं हर्ता भी नहीं था
कैसे कहूँ?
मेरा यस तुझे अखरता नहीं था
तुम हमारी आन बान शान थे
स्वाभिमान थे
हम भी तो इन्सान थे।
माना कि वे तेरे अपने होगें
तो हम क्या तुम्हारे नहीं थे
क्या वे ही तुम्हारे थे हम तुम्हारे नहीं थे।
लेकिन तुमने हमारी बर्बादी का क्यों प्रण बना लिया
अरे, हम तो उन्हें देख कर मुस्कराये भी नहीं
तुमने मुझे रावण बना दिया
तुम कहते हो तुमसे हमारा नाता है
हम भी कहे थे
तुम्हारे लिए कितने जुल्म सहे थे
चुप हो कर रहे थे
तुम्हे याद है न, वही लोग क्या कहे थे
नारा भी लगा था,
तिलक तराजू तलवार का
आज भी लग रहा होगा शायद इसी विचार का
फिर क्यों?
हमारा खून नहीं था जो पेप्सी समझ कर तुम पिए थे
इतने दिन किस प्रकार जिए थे।
तुमने इस जिंदगी को किस कारण रण बना दिया
अरे, हम तो उनको देख कर मुस्कराये भी नहीं थे
तुमने हमको रावण बना दिया
2-
हे मीटू
मैं शादीशुदा था
मैं तो बच्चे का बाप था
तुम्हारे स्वरूप का भी उस समय प्रचंड प्रताप था।
एक फूल की तरह
तुम खिले हुए थे।
पत्नी से ज्यादा
मां बाप से ज्यादा
भाई बहन से ज्यादा
यार दोस्तों से ज्यादा
बाल बच्चों से ज्यादा दिल के नजदीक रहते थे
दिल से मिले हुए थे ।
तुम वैसे भी हमारे थे
हमारे होना चाहते थे
या यूं कहें अपना सरनेम खोना चाहते थे।
हमारी याद में तुम थे
तुम्हारी याद में भी हम होंगे
न जाने तुम्हारे कितने सपने हम जरूर पूरे किए होंगे।
वह दिन याद होगा
जब हम आबाद थे
लेकिन तुम्हारे लिए, हम भी बर्बाद थे।
तुम हमको अपना जीवन कहते थे
हम तुमको अपना धन कहते थे
कुछ याद है तुम हमसे क्या हरदम कहते थे।
सुबह तुम से होती थी
शाम तुम्हारे बिना अधूरी होती थी
कभी सामने तुम्हारी तस्वीर जरूरी होती थी।
दूरी भी थी, मजबूरी भी थी
जी हजूरी भी होती थी क्या पता है किसी समय तुम हमारी किस्मत होती थी।
घर भी कहने लगा था
पारिवार भी कहने लगा था
बाल बच्चे भी और रिश्तेदार भी कहने लगा था।
शक के बादल गहराते गए थे
लेकिन हम करीब आते गए थे
तुम्हारे फरमान होते थे हमारे एहसान होते थे
वह समय याद करो जब तुम हमारे लिए भगवान होते थे।
अच्छा मैं ही कहता हूं
कहना नहीं चाहता हूँ
हमारे आपके बीच शहरों की दूरी बहुत थी।
हमने कभी मुंह नहीं खोला
आपने भी कभी कुछ नहीं बोला
लेकिन आप को हमारी जरूरत भी बहुत थी।
जब हमारे तरफ से आभाव पड़ा था
याद है हम लोगों पर
जब चौतरफा दबाव पड़ा था।
आपके दिल के भी ताले खुल गए
मजबूरी कोई नहीं थी,
मगर
आप कुछ और ही कबूल गए।
उस दिन से आज तक सामने नहीं आए
आए भी तो आंख से आंख नहीं मिलाये
हम पछता रहे हैं क्या आप पछताए।
क्योंकि मर्यादा की भंग हुई थी
दोनों तरफ से केवल हमारे संग हुई थी
लेकिन आप बचाओ में तो छोड़िए सहानुभूति में भी नहीं आए।
छोड़िए वह समय बीत गया
कोई कहीं और कोई कहीं गया
मर्यादा ए तारतार मेरी ही हुई, केवल आप के लिये।
सख्त निर्णय नहीं ले सका मैं केवल पाप के लिए
जो कुछ हुआ उसके कारण आप थे
कह दीजिए कि आपने किये कोई पाप थे
फिर क्या है मीटू
कैसे चलें हम तुमको कुछ बताएं

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