CBI निदेशक आलोक वर्मा ने कहा- PMO, सुशील मोदी और अस्थाना लालू यादव के खिलाफ केस दर्ज करने का बना रहे थे दबाव

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नई दिल्ली,। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने राकेश अस्थाना द्वारा आलोक वर्मा पर लगाए आरोपों को लेकर सीवीसी को जांच करने का आदेश दिया था। सीवीसी ने इस संबंध में अपनी जांच रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को बीते सोमवार को सौंप दी थी।
सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा द्वारा केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) को भेजे गए जवाब से ऐसा प्रतीत होता है कि विशेष निदेशक राकेश अस्थाना, प्रधानमंत्री कार्यालय और
भाजपा नेता व बिहार के उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी एक साथ मिलकर आईआरसीटीसी घोटाले में राजद नेता लालू प्रसाद यादव को गिरफ्तार कराने की कोशिश कर रहे थे।
बीते शुक्रवार को हुई सुनवाई में कोर्ट ने आलोक वर्मा को सीवीसी जांच रिपोर्ट सौंप दी है और उनसे इस पर जवाब मांगा हैं. अगली सुनवाई मंगलवार यानी 20 नवंबर को होनी है।
अपने जवाब में सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त केवी चौधरी पर पक्षपात और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है।
इतना ही नहीं, आलोक वर्मा ने मोदी सरकार पर भी ये आरोप लगाया है कि उनकी वजह से ही इस समय देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी में घमासान चल रहा है।
राकेश अस्थाना का आलोक वर्मा के खिलाफ एक मुख्य आरोप यह था कि उन्होंने राजद नेता लालू यादव के खिलाफ केस को कमजोर किया था।
हालांकि आलोक वर्मा ने इस आरोप से सीधे इनकार किया है। अस्थाना इस मामले की जांच कर रहे थे. आलोक वर्मा ने आरोप लगाया है कि अस्थाना इस मामले में राजनीतिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
अस्थाना के आरोप पर सीवीसी ने आलोक वर्मा से पूछा कि उन्होंने आईआरसीटीसी मामले में प्रारंभिक पूछताछ के विकल्प को क्यों चुना, जबकि राकेश अस्थाना ने इस मामले को एक नियमित केस की तरह दर्ज करने की मांग की थी।
वर्मा ने अपने जवाब में कहा कि राकेश आस्थाना, जो कि उस समय अतिरिक्त निदेशक थे, ने इस तथ्य को दबा दिया था कि
ऐसा ही मामला सीबीआई में 2013-14 में भेजा गया था और इसे बंद कर दिया गया था. उन्होंने ये भी कहा कि इस मामले में ‘पॉलिटिकल एंगल’ था।
उन्होंने आगे कहा, ‘राकेश अस्थाना, भाजपा नेता सुशील मोदी और प्रधानमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के लगातार संपर्क में थे’।
वर्मा ने कहा कि चूंकि ये मामला राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील था और बिहार के लॉ एंड ऑर्डर की संभावित समस्याओं को देखते हुए उन्होंने सोचा कि
इस केस में जल्दबाजी बरतने से अच्छा होगा कि सावधानीपूर्वक सभी प्रकियाओं का पालन किया जाए. ये मामल 11 साल (2004-06 से संबंधित) पुराना है।
इसलिए उन्होंने सीबीआई के सबसे बड़े कानूनी अधिकारी अभियोजन पक्ष के निदेशक (डीओपी) और अतिरिक्त कानूनी सलाहकार (एएलए) से मामले की कानूनी पहलुओं को देखने को कहा।
वर्मा ने कहा कि उन्होंने मामले में प्रारंभिक जांच के आदेश इसलिए दिए क्योंकि सीबीआई के कानून अधिकारियों ने कहा कि ‘सबूत कमजोर हैं और नियमित केस दर्ज करने से पहले और साक्ष्यों को इकट्ठा करने की जरूरत है’।
उन्होंने आगे कहा कि उस समय बिहार की राजनीति में जो चल रहा था उसे देखते हुए हमें और सावधानी बरतने की जरूरत थी।
बता दें कि आईआरसीटीसी घोटाला विवाद के समय बिहार में महागठबंधन की सरकार टूट गई थी और नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर नई सरकार बना ली थी।
इस मामले को लेकर दूसरा आरोप ये था कि आलोक वर्मा ने तत्कालीन आईआरसीटीसी निदेशक राकेश सक्सेना के नाम को बतौर आरोपी शामिल नहीं किया. अस्थाना का मानना है कि सक्सेना की इस मामले में मुख्य भूमिका है।
वर्मा ने कहा कि केस दर्ज करने के दौरान अस्थाना समेत किसी ने भी इस बात को संज्ञान में नहीं लाया कि राकेश सक्सेना का नाम शामिल करना है। जब सीबीआई ने अस्थाना के खिलाफ केस दर्ज कर लिया तो इसके बाद वे खुद पर लगे आरोपों से ध्यान भटकाने के लिए ऐसा कर रहे हैं।
आलोक वर्मा ने सीवीसी को बताया कि सीबीआई निदेशक इस बात को लेकर डरे हुए थे कि तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और
दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के आवास पर छापा मारने से बिहार में लॉ एंड ऑर्डर की समस्या खड़ी हो सकती है. वर्मा ने कहा कि वे अपने अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर भी चिंतिंत थे।
वर्मा ने कहा, ‘चूंकि पीएमओ के एक बड़े अधिकारी इस मामले को लेकर लगातार संपर्क में थे, इसलिए मैंने इस समस्या के बारे में उन्हें बताया था।
ये फैसला लिया गया की छापेमारी के बारे में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बताया जाए और उन्हें विश्वास में लिया जाए. इसके बाद योजनाबद्ध तरीके से छापेमारी की गई थी।’
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आलोक वर्मा ने आगे कहा, ‘अगर आयोग को इन घटनाओं की पुष्टि करनी है तो मैं पीएमओ के उस अधिकारी और अन्य लोगों के नाम बता सकता हूं जो इस पूरी बहस और बिहार के मुख्यमंत्री को विश्वास में लाने में शामिल थे।’

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