बेहमई में बेरहमी से हुए नरसंहार के 40 साल हुए पूरे, न्याय की आस में अभी भी गूंजती है घंटे की आवाज

आर जे न्यूज़-

कानपुर देहात -: देश से बहुत चर्चित नरसंहार कांड जो जनपद कानपुर देहात के बेमही में आज के ही दिन घटित हुआ था। देश के बहुचर्चित नरसंहार के 14 फरवरी आज से 40 साल पूरे हो गए। मुकदमे के आरोपियों से लेकर मुख्य वादी तक की मौत भी हो चुकी है लेकिन नरसंहार का फैसला नहीं हुआ।
आज भी लोग बेहमही कांड को याद करके सहम जाते हैं।

आज भी जब लोग कानपुर देहात के राजपुर थाना क्षेत्र के बेहमई गांव के उस रास्ते से गुजरते हैं जहां पर डाकू फूलन देवी ने कइयों के सुहाग छीन लिए थे तो कईयों की कोख खाली कर दी थी आज भी वहां से निकलते समय लोगों के दिलों दिमाग में वही मंजर गूंजने लगता है और कदम डगमगाने लगते हैं।
आज भी स्मारक के सिला पट नजर डालते ही आंखें डबडबा जाती हैं जिसमें नरसंहार में मारे गए 20 लोगों के नाम अंकित है। जिसे डाकू फूलन देवी और उसके गैंग ने हमेशा के लिए नींद की गोद में सुला दिया था।

नरसंहार में गोलियों की बौछार के बीच से बच निकले जंतर सिंह ने स्मारक में एक घंटा लगवाया। जिसे गांव वाले बजाकर याद रखना चाहते हैं कि इंसाफ की लड़ाई अभी बाकी है। वही नरसंहार से किसी तरह बच निकले लोगों ने घटना स्थल पर ही स्मारक बनवा दिया जिसमें नरसंहार से बचे जंतर सिंह ने स्मारक में घंटा लगवा दिया। जिसे बजाकर गांव वाले आज भी जल्द न्याय की आस लगाते हैं फिलहाल मुकदमा कोर्ट में चल रहा है।

14 फरवरी 1981 का दिन मुझे वो जख्म दे गया, जो अब तक भर नहीं सका है। आज के ही दिन फूलन गैंग ने मेरे 20 लाल गोलियों से छलनी कर दिए थे। संघर्ष करते 40 साल बीत गए, लेकिन अभी तक मुझे इंसाफ की दरकार है।पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक 40 साल पहले 14 फरवरी को दिन के लगभग 3:00 बजे का समय था। जब डाकू फूलन देवी ने अपने गैंग के साथ बेहमई गांव को घेर लिया था।और अपने जानी दुश्मन लाला राम और श्री राम को ढूंढ रही थी। उसे विश्वास था कि ऊंची जाति बहुल गांव के लोग ही उनको इस गांव में शरण देते हैं।

फूलन देवी के गैंग ने घर-घर की तलाशी ली लेकिन लाला राम और श्री राम तो नहीं मिले | तो उसने गांव के एक एक पुरुष को खींच निकाला और एकत्रित कर गोलियों से उड़ा दिया।

जिसमें 20 लोग मारे गए। वही नरसंहार से किसी तरह बच निकले लोगों ने घटना स्थल पर ही स्मारक बनवा दिया जिसमें नरसंहार से बचे जंतर सिंह ने स्मारक में घंटा लगवा दिया। जिसे बजाकर गांव वाले आज भी जल्द न्याय की आस लगाते हैं फिलहाल मुकदमा कोर्ट में चल रहा है।

हुआ क्या था 40 साल पहले:-

फरवरी महीने में शनिवार के दिन 14 फरवरी को ही दोपहर के वक्त जब बच्चे खेलकूद में व्यस्त थे, तभी खाकी वर्दी पहने डकैतों का हुजूम फूलन के साथ बेहमई गांव में घुसा था। डकैत श्रीराम व लालाराम के नहीं मिलने पर फूलन देवी ने 26 लोगों को एक लाइन में खड़ा करके गोली मार दी थी। जिनमें 20 की मौत हो गई थी। इस नरसंहार में महज चार दिन पहले ब्याह कर आई 16 साल की मुन्नी के पति लाल ङ्क्षसह भी मारे गए थे।

संतोषी, विद्यावती समेत कई विधवाएं ये दु:ख भूल नहीं पाई हैैं। मामले में तारीख पर तारीख मिलते हुए 31 साल बाद पहली गवाही वर्ष 2012 में हुई थी। वादी राजाराम भी दिसंबर 2020 में दुनिया से चले गए। उनके भाई शिशुपाल, बेटे बादाम ङ्क्षसह व रामकेश समेत दूसरे ग्रामीण कहते हैं कि संघर्ष जारी रखेंगे लेकिन पता नहीं कब इंसाफ मिलेगा। बचे डकैतों को उनके किए की सजा कब मिलेगी।

गांव भी लगभग समय के साथ-साथ पूरा बदल चुका है :-

सिकंदरा कस्बे से करीब 22 किलो मीटर दूर बेहमई तक वर्ष 2018-19 में पक्की और चौड़ी सड़क बन चुकी है। 10 साल पहले तक यहां कच्चा रास्ता था। घटना के वक्त वाहन तक नहीं चलते थे। पैदल ही आवाजाही होती थी। दो साल पहले विद्युतीकरण भी हो चुका है। जब नरसंहार हुआ था, तब गांव के अधिकांश घर कच्चे व झोपड़ी वाले थे। अब 950 की आबादी वाले गांव में करीब 300 मकान हैं। गांव में 23 साल पहले प्राथमिक स्कूल खुला था। वहीं, गांव में करीब 15 लोग विभिन्न सरकारी नौकरियों में हैं। इसमें तीन लोग शिक्षक हैं, जबकि बाकी पुलिस व सेना में हैं।

तीन डकैत जिंदा है तो एक डकैत जेल में है:-

डकैतों में पोसा वर्तमान में जेल में बंद है, जबकि भीखा व श्यामबाबू जमानत पर हैं। जिला शासकीय अधिवक्ता राजू पोरवाल कहते हैं कि मूल केस डायरी नहीं मिलने से फैसला लंबित है। एसपी कानपुर देहात को कोर्ट ने निर्देश दिया था कि इसे खोजकर पेश करें, लेकिन अभी तक कुछ पता नहीं चल सका है।

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