जगद्गुरु रामभद्राचार्य और शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की आपस में क्यों नहीं बनती?

राष्ट्रीय जजमेंट

प्रयागराज में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी के खिलाफ पिछले एक साल में एक नाबालिग समेत दो व्यक्तियों के यौन शोषण के आरोपों को लेकर प्राथमिकी दर्ज करने के बाद सियासत गर्मा गयी है। हम आपको बता दें कि जगद्‌गुरु रामभद्राचार्य के शिष्य आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ यौन शोषण के गंभीर आरोप लगाए हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मुकुंदानंद के अलावा दो-तीन अज्ञात लोगों पर भी मुकदमा दर्ज किया गया है।प्राथमिकी के अनुसार, वादी आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज ने दावा किया कि हाल में प्रयागराज में संपन्न माघ मेले में उनके ट्रस्ट द्वारा आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम के दौरान एक नाबालिग लड़के समेत दो लोग आए और उन्होंने माघ मेले समेत धार्मिक कार्यक्रमों के दौरान तथा एक गुरुकुल में उनके यौन शोषण के आरोप लगाए। इसमें आरोप लगाया गया है कि ये कृत्य ‘‘गुरु सेवा’’ की आड़ में और धार्मिक प्रभाव का दुरुपयोग करके किए गए थे।उधर, इस मामले ने राजनीतिक रूप से तूल पकड़ लिया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि शिकायतकर्ता रामभद्राचार्य का शिष्य है और उनसे गलती हुई कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान रामभद्राचार्य से जुड़ा मुकदमा वापस लिया था, उन्हें जेल भेज देना चाहिए था। वहीं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपनी सफाई में कहा है कि जो भी आरोप लगाये जा रहे हैं वह निराधार हैं और वह प्रशासन के साथ पूरा सहयोग करेंगे।अब सवाल उठता है कि शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और जगद्गुरु रामभद्राचार्य के बीच मतभेद आखिर किस कारण से हैं? इस सवाल का जवाब वैसे तो यही दोनों महानुभाव दे सकते हैं लेकिन हाल के दोनों के बयानों का अध्ययन करने से कुछ बातें सामने आती हैं जिनको विवाद का संभावित कारण माना जा सकता है। खबरों में सामने आता है कि रामभद्राचार्य ने अविमुक्तेश्वरानंद को ‘फर्जी’ कह दिया, जबकि वह खुद को स्थापित शंकराचार्य मानते हैं। रामभद्राचार्य ने सवाल उठाया है कि जब तक न्यायालय से मान्यता नहीं मिलती, तब तक किसी को स्वयं को शंकराचार्य घोषित करने का अधिकार नहीं है, जो अप्रत्यक्ष रूप से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर हमला था।साथ ही इस वर्ष माघ मेले के दौरान संगम तक पालकी/रथ ले जाने की परंपरा और पुलिस द्वारा रोके जाने पर दोनों के विचार अलग थे। रामभद्राचार्य ने नियमों का हवाला देकर रोक को सही ठहराया। दोनों के बीच की लड़ाई व्यक्तिगत स्तर पर पहुँच गई है, जिसमें एक-दूसरे को ‘अंधा’, ‘विकलांग’ या ‘नकली’ कहने जैसी बातें सामने आई हैं। साथ ही यह भी सामने आता है कि रामभद्राचार्य ने पहले शंकराचार्य की राजनीतिक समझ पर सवाल उठाए थे, जिसके जवाब में उन्हें ‘अपरिपक्व’ या ‘ज्यादा बोलने वाला’ कहा गया। देखा जाये तो यह विवाद मूलतः परंपरावादी (शंकराचार्य पीठ) और भक्तियोग (रामभद्राचार्य) की धाराओं के बीच संतुलन और मान्यता का मामला है, जो व्यक्तिगत टिप्पणियों के कारण और बढ़ गया है।

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