राष्ट्रीय जजमेंट
वाणी और वाणी के महात्म्य को समझना है तो प्रो.संजय द्विवेदी की संगति कीजिए। मौन को पढ़ना सीखना हो, स्निग्धता की तपस्या को जानना हो तो उनके व्यक्तित्व को जानिए, पहचानिए। सच कहूं, विरले होते हैं वे लोग, जिन्हें चंदन और पारसमणि का स्पर्श हुआ हो जैसा संजय जी भाई साहब को हुआ है। हम बहुत भाग्यशाली हैं कि हमने स्वयं को आधुनिक पत्रकारिता के शुभ्र ललाट की संगति रूपी चंदन-पारसमणि की छुअन से परिष्कृत किया है।
समय के साथ रहना, समय के साथ चलना और अपने समय से संवाद करना किसी को आता है तो वे मीडिया गुरु, पत्रकारों के आदर्श भारतीय जनसंचार संस्थान के पूर्व महानिदेशक प्रो.(डा.) संजय द्विवेदी हैं। वे कहते हैं भाषाएं और माताएं अपने बच्चों से ही सम्मान पाती हैं। तो आपने मां, मातृभूमि और मातृभाषा को प्रमुख स्थान देकर समाज तथा मीडिया में अपना उच्च स्थान बनाया है। आपने सदैव स्वयं को पत्रकारिता का विद्यार्थी मानकर ही अपने समय से संवाद किया है और आज भी कर रहे हैं। आपका सरल व्यक्तित्व, चंद्रमा-से ओजस्वी चेहरे पर अठखेलियां करती चंचल मंद मुस्कुराहट, उन्नत भाल पर संवाद संग घहराती-लहराती-अठखेलियां करती विचारों की रेखाएं, मुखारबिंदु से प्रवाहित परमहंसी धीर-गंभीर वाणी चंदन की भांति हर ताप-समस्या का त्वरित समाधान ऐसे उपस्थित करती है जैसे कोई नदी अपने जल से बिना लाग-लपेट सबको अभिसिंचित करती बहती रहती है।
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