चन्द्र दर्शन के बाद पति दर्शन व पूजन के साथ हुआ व्रत का पारण

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पति के दीर्घायु के लिये पत्नियों ने शनिवार को करवा चौथ का निराजल व्रत रखा। साथ ही विधि-विधान से पूजा-पाठ करके पति के दीर्घायु सहित परिवार के सुख-समृद्धि की कामना किया।

 

मान्यता के अनुसार करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाएं पति के दीर्घायु की कामना के लिये निराजल रखती हैं। देखा गया कि सायंकाल स्नान करके नये वस्त्र धारण कीं।
जिसके बाद सोलह श्रृंगार करके महिलाएं चन्द्रोदय के पूर्व भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश व कार्तिकेय की पूजा कीं। पूजा से पूर्व घर के आंगन या छत पर गाय के गोबर से लिपाई करके आटा से चौक बनायीं जिसमें मिट्टी का बना करवा रखीं।
करवा पर पूसा (सरई) की लकड़ी रखने के बाद शिव, पार्वती, गणेश व कार्तिकेय की तस्वीर रखकर पूजा की।
तत्पश्चात् चन्द्रमा के उदय होते ही महिलाएं चलनी से चांद का दर्शन करने के बाद पति का दर्शन करके उनकी भी पूजा की जिसके बाद पति द्वारा व्रत का पारण करवायी।
जानकारों के अनुसार कार्तिक मास कृष्ण पक्ष चतुर्थी को करवा चौथ व्रत पड़ता है जिस दिन सुहागिन महिलाएं अपने अचल सुहाग एवं पति के दीर्घायु के साथ ही परिवार के मंगलकाना के लिये व्रत रखती हैं।
पूरे दिन निराजल व्रत रखने वाली महिलाएं शाम को स्नान के बाद नये परिधान ग्रहण कीं। साथ ही सोलह श्रृंगार करके नदी, तालाब, नहर आदि के किनारे जाकर चन्द्र दर्शन की।
इसके बाद चलनी में पति का दर्शन करने के बाद उनकी आरती उतारीं। साथ ही उनके हाथ से पानी पीकर अपने व्रत का पारण कीं। 
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मान्यता है कि सूर्योदय से चन्द्रोदय तक रहने वाला यह व्रत केवल जल ग्रहण करके रखा जाता है जिसका पारण पति द्वारा पानी पिलाने के बाद ही होता है। इसके बाद घर में बने पकवान को ग्रहण किया जाता है।

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