अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए…
दुनिया में मज़हबी हिंसा की न जाने कितनी घटनाएं हर रोज सुनाई और दिखाई पड़ती है।

रमजान में

लेकिन दो मज़हबों की मोहब्बत छिपी रह जाती है. गंगा जमुनी तहज़ीब का वारिस हिंदुस्तान आज
इसी बुनियाद पर खड़ा है। आइए दिल को सुकून देने वाली एक सच्ची घटना आप से साझा करें….
अधिकारी ने अपने ड्राइवर से पूछा, ” जफर रमजान का पाक महीना चल रहा है। तुमने रोजे रखे या नहीं।’
जफर थोड़ा भावुक हुआ और बोला, सर नहीं रख पा रहा हूं।
पिछले कुछ दिनों से मेरी तबियत ठीक नहीं रह रही और सर,
ड्यूटी भी मेरी ऐसी ही है कि मैं रोजे नहीं रख सकता।”
जफर के जवाब में उसकी भावनात्मक अपील उस ऑफिसर के दिल में इस कदर बैठी कि
वो भी कुछ पल के लिए निशब्द हो गए। ऑफिसर को पता था कि
उनके लिए जिस तरह नवरात्रि पर्व का महत्व है और नौ दिन व्रत रखने की धार्मिक भावनांए जुड़ी हुई हैं।
वैसे ही जफर के लिए भी रमजान का पाक महीना है। गाड़ी का सफर यूं हीं चलता जा रहा था।
ऑफिसर किसी ख्यालों में खोया हुआ था. तभी अचानक जफर बोला,
सर क्या हो गया? कहां खो गए आप? क्या सोचने लगे ?हमारी मंजिल भी आ गई।
ऑफिसर चौंका और बोला, ” जफर एक बात सोच रहा था कि
क्या मैं तुम्हारी जगह रोजे रख सकता हूं? तुम अपनी दिनचर्या और
पूरा विधि-विधान बता तो मैं वैसे ही पूरा पालन करुंगा. अगर तुम्हारी इज़ाजत हो तो।
जफर के पास शब्द नहीं थे कुछ भी कहने को. ऑफिसर ने सोचा कि शायद उनसे कोई गलती हो गई।
लेकिन वो गलत थे। तभी जफर बोला, सर आप कैसे रहेंगे।
तभी वो ऑफिसर बोला क्यूं मैं नहीं रह सकता? जफर बोला कि
नहीं सर रह तो सकते हैं लेकिन आप कैसे? उसके सवाल हजार थे लेकिन
उसके लबों से अल्फाज नहीं निकल पा रहे थे। उसके बाद जफर ने
अपने अधिकारी को पूरी दिनचर्या बताई।
और पूरे नियम-कायदे समझाए। अधिकारी ने पूरी बात समझ ली और रोजे रखने लगे।
ये शख्स है महाराष्ट्र के बुलधाना के मंडल वन अधिकारी संजय माली।
जिन्होंने अपने मुस्लिम ड्राइवर जफर के बदले रोजा रखा है।
माली ने कहा, ‘मैंने 6 मई को जफर से यूं ही बातचीत में पूछा था कि
वह रोजा रख रहा है या नहीं? इस पर उसने बताया कि वह इस बार
खराब सेहत के चलते ड्यूटी के साथ रोजे नहीं रख पाएगा।
तब मैंने उससे कहा कि मैं उसकी जगह रोजे रखूंगा।’
उन्होंने अपनी दिनचर्या के दौरान बताया, ‘6 मई से मैं रोजाना रोजे रख रहा हूं।
मैं सुबह 4 बजे उठ जाता हूं और कुछ खाता हूं।
इसके बाद करीब 7 बजे मैं रोजा खोलता हूं।’ संजय का मानना है कि
हर किसी को सांप्रदायिक सौहार्द्र बढ़ाने के लिए अपने स्तर पर कुछ ना कुछ जरूर करना चाहिए।
इस खबर का सिर्फ इतना ही मकसद है कि हम अपने आस-पास कुछ ऐसा माहौल बनाएं ताकि
आने-वाली नस्लें हम पर गर्व करें। नफरत के बीज हर कोई बोने में तुला है।
मानवता को मजहब में बांटने पर हर कोई आमदा है। लेकिन हम एक नई शुरुआत कर सकते हैं।
जिस तरह किसी इमारत की बिल्डिंग बनाते वक्त एक-एक ईंट का महत्व होता है।
उसी तरह हिंदुस्तान की नींव यहां रहने वाला हरेक नागरिक है।
यह सच्ची घटना अलम्मा इकबाल साहब के शेर के बिना कुछ अधूरी सी है।
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा।

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