नाम पर फिजूल की राजनीति, अब पहचान से पहचान की लड़ाई का युग है

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कभी-कभी लगता है कि नाम में कुछ होता है। काफी परिवारों में नवजातों के नाम रखने के लिए खासी खोज की जाती है और
कई बार तो ऐसा नहीं समझ में आने वाला नाम रख दिया जाता है जो बिगड़ जाता है।
बाद में सोचते हैं कि कुछ और नाम ही रख देते।
आजकल पौराणिक चरित्रों पर नाम रखने का शौक लौट रहा है।
ठीक वैसे ही, जैसे जिंदगी को ऑर्गेनिक करते जा रहे हैं। पिछले दिनों काफी मगजमारी के बाद मेरे परिचित ने पूछा कि लड़के के लिए माधव नाम कैसा रहेगा।
मैंने कहा कि आपको पसंद है तो इससे बेहतर नाम क्या हो सकता है। ससुराल वाले नव-वधुओं के नाम, फेरों के समय तक बदलते देखे गए हैं।
हालांकि अब तो विवाह के बाद पत्नी को नाम और उपनाम यानी सरनेम बदलने की जल्दी नहीं होती।
कितने ही मिले-जुले पसंदीदा नाम हिंदू, मुसलिम, सिख और ईसाइयों ने रखे होंगे।
यह भावना नहीं होती होगी कि भाषा, धर्म और संप्रदाय के आधार पर हिसाब-किताब करके ही नामकरण किया जाए।
किसी भी पार्क, सड़क, इमारत या शहर का नाम बदलने की इच्छा राजनीतिकों के बीच देखी जाती है। हमारे देश की विविधता को ही शक्ति माना जाता है।
लेकिन देखा जाए तो भाषा, लिबास, खानपान, रीति-रिवाज और अन्य विविधताओं को काबू में रखने के लिए राजनीतिक शक्ति तो जरूरी माना जाता है।
हमारा देश विभिन्न संस्कृतियों में इतना ज्यादा और ऐसे गुंथा हुआ है, जैसे किसी स्वेटर का महीन और मुश्किल से समझ में आने वाला पैटर्न, जिसकी नकल करना आसान नहीं।
लेकिन राजनीति चूंकि ताकत की संतान होती है, इसलिए किसी को भी नहीं बख्शती।
अब पहचान से पहचान की लड़ाई का युग है।
राजनीति ने पहचान फैलाने के लिए नाम बदलने की नीति को भी अपने क्रियाकलाप में शामिल कर रखा है।
कुत्सित, स्वार्थपूर्ण, धार्मिक राजनीति के जमाने में गली, सड़क, शहर और
इमारतों के नाम पर राजनीति न हो, यह कैसे हो सकता है।
इसमें धर्म को एक हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है।
गोत्र, परिवार, समूह, मत, संप्रदाय, धर्म अपनी पहचान स्थापित कर नाम अर्जित करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं।
नाम रखने और बदलने में पहले भी राजनीति को तवज्जो दी जाती रही है, लेकिन संभवत इतनी ज्यादा नहीं।
पिछले दिनों दुनिया भर में प्रसिद्ध पर्यटक स्थल शिमला का नाम ‘श्यामला’ करने की राजनीतिक इच्छा को बुरी तरह से मुंह की खानी पड़ी।
कुछ समूहों को इसमें से अंग्रेजियत की बू आने लगी थी।
सवाल है कि अंग्रेजों और मुगलों जैसे अन्य पूर्व शासकों ने जिन बागों,
तालाबों, नहरों, शहरों और इमारतों की रचना की, क्या अब वह सब हमारा नहीं है?
सरकार द्वारा कितनी ही सड़कों इमारतों और शहरों के नाम बदल भी दिए जाएं,
लेकिन जबान पर नहीं चढ़ते, क्योंकि पुराने शब्द जबान की सीढ़ी से आसानी से नहीं उतरते।
वास्तव में पुराने नाम मुंह से तो क्या, दिल से ही नहीं उतरते।
नाम पर फिजूल की राजनीति न कर कभी यह भी सोचा जाना चाहिए कि
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दुनिया भर की शोहरत की किताबों में उनका जो नाम है, वही पहचाना जाता है।
बेहतर हो कि जगह के सही रखरखाव, स्वच्छता, सुरक्षा, यातायात, उत्तम प्रसाधन और
अन्य जरूरी नागरिक सुविधाओं पर संजीदा काम कर दुनिया भर में अच्छा नाम कमाने की कोशिश की जाए।

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