सरकारों को चुनावों में भारी पड़ सकती है किसानों के दर्द की आह 

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देशभर के किसानों का दर्द यह है कि उन्हें समय पर न तो डीजल का अनुदान मिलता है, न ही खाद-बीज और न तो फसल नुकसान होने पर वाजिब बीमा राशि। सिंचाई के लिए सरकारी नलकूप योजनाएं दम तोड़ रही हैं या तोड़ चुकी हैं। नई सरकारी योजनाओं की जानकारी भी किसानों को नहीं मिल पाती है।
धान, गेहूं और अन्य फसलों के बीज के लिए भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। सरकार की लंबी चौड़ी योजनाएं धरातल पर फिसड्डी साबित हो रही हैं, जबकि कागजों में सुपरहिट। अधिकतर किसान अपने बलबूते खेती कर रहे हैं।
इतना ही नहीं महंगाई बढ़ने और खेतिहर मजदूरों की कमी की वजह से खेती महंगी हो गई है पर किसानों को फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। लिहाजा, किसान कर्ज के बोझ दबते जा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधा नहीं होने से किसानों को शहरों में जाकर महंगी शिक्षा और इलाज पर खर्च करना पड़ता है, इससे उनकी जेब पर अधिक बोझ पड़ता है।
महाराष्ट्र के किसानों का गुस्सा और चरम पर है। वहां किसानों ने विरोध में ठंड के मौसम की फसल नहीं बोई है। फिलहाल 10 रुपये प्रति किलो के नुकसान पर अनार बेच रहे हैं। नासिक में किसानों का गुस्सा सातवें आसमान पर है क्योंकि वो प्याज एक-दो रुपये प्रति किलो बेच रहे हैं, जबकि शहरों में वही 20-25 रुपये प्रति किलो मिल रहा है।
किसानों की शिकायत है कि उन्हें फसल की सही कीमत नहीं मिल रही, जबकि शहरों में बनने वाले बल्‍ब गांवो में भी 30 रुपये में बिक रहे हैं। पिछले महीने 29-30 नवंबर को देशभर के हजारों किसानों ने दिल्ली पहुंचकर केंद्र सरकार को चेताया और
सरकार से कर्ज से पूरी तरह मुक्ति देने और फसलों की लागत का डेढ़ गुना मुआवजा दिलाने की मांग की। इससे पहले महाराष्ट्र के करीब 30 हजार किसानों ने 22 नवंबर को मुंबई पहुंचकर लोड शेडिंग की समस्या, वनाधिकार कानून लागू करने,
सूखे से राहत, न्यूनतन समर्थन मूल्य, स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने जैसी मांगें भाजपा सरकार के सामने रखीं। किसान सरकार द्वारा किए गए नौ महीने पुराने वादे को निभाने का भी दबाव बना रहे थे।
किसान नेता योगेंद्र यादव और अन्य राजनीतिक जानकारों का कहना है कि वाजपेयी के इंडिया शाइनिंग जैसा हाल 2019 में भी हो सकता है क्योंकि 2004 में भी ग्रामीण किसानों का गुस्सा सातवें आसमान पर था। हालांकि, तब वो संगठित होकर विरोध-प्रदर्शन नहीं कर पाए थे।
अब स्थितियां वैसी नहीं रहीं। बता दें कि मोदी राज में किसानों ने पहला झटका भाजपा को गुजरात विधान सभा चुनाव में दिया था। इसके बाद दूसरा बड़ा झटका हालिया विधान सभा चुनावों में लगा है, जब तीन राज्यों (मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़) के कुल 436 ग्रामीण विधान सभा सीटों में मात्र 35 फीसदी सीटों पर ही भाजपा जीत सकी, जबकि
55 फीसदी सीटों पर कांग्रेस जीती है। अगर यही गुस्सा पांच महीने तक जारी रहा तब भाजपा को 2019 के आम चुनाव में बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है क्योंकि कुल 542 लोकसभा सीटों में से मात्र 55 सीटें हीं शहरों की हैं, शेष ग्रामीण इलाके में पड़ती हैं।
भारत में हरित क्रांति के जनक माने जाने वाले मशहूर कृषि विशेषज्ञ एम एस स्वामीनाथन ने हाल ही में कहा था कि दो दिन का किसान आंदोलन उनके गुस्से और दुख को जाहिर कर रहा है।
आंकड़े बताते हैं कि पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी और पीएम नरेंद्र मोदी की एनडीए सरकार के दौरान खाद्यान्नों को थोक मूल्य और ग्रामीण मजदूरी की दर में गिरावट दर्ज हुई है, जबकि यूपीए शासनकाल में इन दोनों में बढ़ोत्तरी हुई है।
यह अलग बात है कि पीएम मोदी ने फरवरी 2016 में एलान किया था कि उनकी सरकार किसानों की आय 2022 तक दोगुनी कर देगी। हालांकि, केंद्र सरकार ने इस दिशा में किसानों के लिए फसल बीमा योजना और कृषि उपज बेचने के लिए इलेक्ट्रानिक प्लेटफॉर्म जैसी कई योजनाएं भी लॉन्च कीं मगर उनका फायदा उन्हें नहीं मिल सका।
इसका नतीजा यह हुआ कि निराश किसानों ने फसल बीमा भी कराना छोड़ दिया। आंकड़े बताते हैं कि 2016 में 4.2 करोड़ किसानों ने खरीफ फसलों का बीमा कराया था जो 2018 तक आते-आते 3.32 करोड़ रह गया। यानी दो वर्षों में 17 फीसदी किसानों ने फसल बीमा योजना को छोड़ दिया।
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इस साल सितंबर में केंद्र सरकार ने किसानों की फसल खरीद के लिए 15,000 करोड़ रुपये की पीएम-आशा योजना लॉन्च किया ताकि किसानों को लागत से 50 फीसदी ज्यादा का रिटर्न दिया जा सके मगर किसानों ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई।

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