तीन राज्यों के चुनाव परिणाम के बाद,अर्थ्वयवस्था का चेहरा भी बदलेगा

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ये पहली बार होगा कि तीन राज्यो के चुनाव परिणाम देश की राजनीति पर ही नहीं बल्कि देश के इकनामिक माडल पर भी असर डालेगें।
खास तौर से जिस तरह किसान-मजदूर के मुद्दे राजनीतिक प्रचार के केन्द्र में आये। और ग्रामिण भारत के मुद्दो को अभी तक वोट के लिये इस्तेमाल करने वाली राजनीति ने पहली बार अर्थव्यवस्था से किसानो के मुद्दो को जोडा वह बाजार अर्थव्यवस्था से अलग होगी,
इसके लिये अब किसी राकेट साइंस की जरुरत नहीं है। ध्यान दें तो काग्रेस ने अपने घोषणापत्र मे जिन मुद्दो को उठाया उसे लागू करना उसकी मजबूरी भी है और देश की जरुरत भी। क्योकि मोदी सत्ता ने जिस तरह कारपोरेट की पूंजी पर सियासत की और
सत्ता पाने के बाद कारपोरेट मित्रो के मुनाफे के लिये रास्ते खोले वह किसी से छुपा हुआ नहीं है । और 1991 में आर्थिक सुधार के रास्ते कारपोरेट के जरीये काग्रेस ने ही बनाये ये भी किसी से छुपा नहीं है।
लेकिन ढाई दशक के आर्थिक सुधार के बाद देश की हथेली पर भूख-गरीबी और असमानता जिस तरह बढी और उसमें राजनीतिक सत्ता का ही जितना योगदान रहा उसमें अब राहुल गांधी के सामने ये चुनौती है कि वह अगर तीन राज्य जीतते है तो वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की लकीर खिंचे।
और शायद ये लकीर खिंचना उनकी जरुरत भी है जो भारतीय इक्नामिक माडल के चेहरे को खुद ब खुद बदल देगी। इसके लिये काग्रेस को अर्थशास्त्री नहीं बल्कि राजनीतिक क्षमता चाहिये।
क्योकि चुनावी घोषणापत्र के मुताबिक दस दिनो में किसानो की कर्ज माफी होगी। न्यूतम समर्थन मूल्य किसानो को मिलेगा। मनरेगा मजदूरो को काम-दाम दोनो मिलेगा। छोटे-मझौले उघोगो को राहत भी मिलेगी और उनके लिये इन्फ्रास्ट्क्चर भी खडा होगा।
अब सवाल है जब ये सब होगा तो किसी भी राज्य का बजट तो उतना ही होगा , तब कौन सा रुपया किस मद से निकलेगा। जाहिर है कारपोरेट को मिलने वाली राहत राज्यो के बजट से बाहर होगी।
और उसी मद का रुपया ग्रामिण इक्नामी को संभालेगा। क्योकि किसान मजदूर या छोटे-मझौले उघोगो के हालात में सुधार का एक मतलब ये भी है कि उनकी खरीद क्षमता में बढोतरी होगी।
यानी कारपोरेट युग में जिस तरह की असमानता बढी उसमें ग्रामीण भारत की पहचान उपभोक्ता के तौर पर कभी हो ही नहीं पायी। फिर जब दुनिया भर में भारत का डंका पीटा जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की पांचवी सबसे बडी इक्नामी हो चुकी है तो
अगला सवाल कोई भी कर सकता है कि जब इतनी बडी इक्नामी है तो फिर भारतीय कारपोरेट अपने पैरो पर क्यो नहीं खडा हो पा रहा है? और उसे सरकार से राहत क्यो चाहिये? फिर एनपीए की सूची बतलाती है कि कैसे दस लाख करोड से ज्यादा की रकम कारपोरेट ही डकार गये और
उनसे वसूली की जगह मोदी सत्ता ने की खेप में राहत देनी शुरु कर दी। और इसी कतार में आम जनता का बैको में जमा रुपया भी कारपोरेट सत्ता से करीबी दिखा कर फरार हो गया। जिन्हे भगौडा कहकर वापस भारत लाने का शिगूफा राजनीतिक तौर पर मोदी सत्ता ने बार बार कही।
लेकिन सवाल ये नहीं है कि जो भगौडे है उन्हे सत्ता वापस कब लायेगी बल्कि बडा सवाल ये है कि क्या वाकई मोदी सत्ता के पास कारपोरेट से इतर कोई आर्थिक ढांचा ही नहीं है। जाहिर है यही से भारतीय राजनीति के बदलते स्वरुप को समझा जा सकता है।
क्योकि जनवरी में मोदी सरकार आर्थिक समिक्षा पेश करेगी और अपने पांच बरस की सत्ता के आखरी बरस में चुनाव से चार महीने पहले अंतरिम बजट पेश करेगी। और दूसरी तरफ काग्रेस अपने जीते हुये राज्यो में कारपोरेट से इतर ग्रामिण इक्नामी पर ध्यान देगी।
यानी राज्य बनाम केन्द्र या कहे काग्रेस बनाम बीजेपी का आर्थिक माडल टकराते हुये नजर आयेगा। और अगर ऐसा होता है तो फिर पहली नजर में कोई भी कहेगा कि जिस आर्थिक माडल का जिक्र स्वदेशी के जरीये संघ करता रहा और
एक वक्त बीजेपी भी आर्थिक सुधार को बाजार की हवा बताकर कहती रही उसमें बीजेपी सत्ता की कहीं ज्यादा कारपोरेट प्रेमी हो गई और काग्रेस भारत के जमीनी ढांचे को समझते हुये बदल गई ।
दरअसल पहली बार राजनीतिक हालात ही ऐसे बने है कि काग्रेस के लिये कोई भी राजनीतिक प्रयोग करना आसान है और बीजेपी समेत किसी भी क्षत्रप के लिये मुशिकल है। क्योकि राहुल गांधी के कंघे पर पुराना कोई बोझ नहीं है।
कांग्रेस को अपनी पुरानी जमीन को पकडने की चुनौती भी है और मोदी के कारपोरेटीकरण के सामानांतर नई राजनीति और वैक्लिपक इकनामी खडा करना मजबूरी है। मोदी सत्ता इस दिशा में बढ नहीं सकती क्योकि
बीते चार बरस में उसने जो खुद के लिये जो जाल तैयार किया उस जाल को अगले दो महीने में तोडना उसके लिये संभव नहीं है। हालाकि तीन राज्यो के जनादेश का इंतजार करती बीजेपी ये कहने से नहीं चूक रही है कि
मोदी वहा से सत्ता हो जहा से काग्रेस या विपक्ष की सोच खत्म हो जाती है। तो ऐसे में ये समझना भी जरुरी है कि चुनाव के जो आंकडे उभर रहे है उसमें बीजेपी से दस फिसदी तक एससी-एसटी वोट खिसके है। किसान-मजदूरो के वोट कम हुये है।
बेरोजगार युवा और पहली बार वोट डालने वालो ने भी बीजेपी की तुलना में  काग्रेस को करीब दस फिसदी तक ज्यादा वोट दिये है। और अगर अगले दो तीन महीनो में मोदी उन्हे दोबारा अपने साथ लाने के लिये आर्थिक राहत देते है तो तीन सवाल तुरत उठेगें।

  1. राज्यो के जनादेश में हार की वजह से ये कदम उठाया गया।
  2. काग्रेस की नकल की जा रही है।
  3. चुनाव नजदीक आ गये तो राहत देने के कदम उठाये जा रहे है।
फिर असल सच तो यह भी है सरकारी खजाना खाली हो चला है तभी रिजर्व बैक से एक लाख करोड़ रुपया बाजार में लाने के लिये रिजर्व बैक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स पर दवाब बनाया जा रहा है। फिर चुनाव जब चंद फर्लाग की दूरी पर हो तो कारपोरेट मित्रो से पूंजी की जरुरत मोदी सत्ता को पडेगी ही।
और कारपोरेट मित्रो को अगर ये एहसास होता है कि मोदी सत्ता जा रही है तो वह ज्यादा दांव मोदी पर ही लगायेगे। क्योकि काग्रेस तब मोदी के कारपोरेट मित्रो की पूंजी से बचना चाहेगी। फिर एक सच ये भी है कि
पहली बार कांंग्रेस ने राजनीतिक तौर पर मोदी के कारपोरेट मित्रो का नाम खुले तौर पर अपने चुनावी प्रचार में ना सिर्फ लिया बल्कि भ्रष्ट्रचार के मुद्दो को उठाते हुये क्रोनी कैपटलिज्म का कच्चा-चिट्टा भी खोला ।
तो चुनावी दांव के बदलते हालात में आखरी सवाल ये भी होगा कि
तीन राज्यो की जीत के बाद काग्रेस महज महागठबंधन में एक साझीदार के तौर पर दिखायी नहीं देगी बल्कि काग्रेस  के ही इर्द -गिर्द समूचे विपक्ष की एकजुटता दिखायी देगी। और इसका बडा असर यूपी में नजर आयेगा जहाँ काग्रेस अकेले चुनाव लड़ने की दिशा में बढेगी।
क्योकि कांग्रेस अब इस हकीकत को समझ रही है कि जब मायावती को तीन राज्यो के दलितो ने कांग्रेस की तुलना में कम वोट दिया तो
यूपी में उसे गठबंधन के साथ जाने पर कोई लाभ नहीं होगा। क्योकि काग्रेस के पारंपरिक वोट बैक सिर्फ किसान तक सीमित नहीं रहे है।
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बल्कि दलित आदिवासी, ओबीसी और ब्राहमण में साथ रहे है। इसीलिये काग्रेस के लिये दिल्ली की सत्ता हमेशा यूपी के रास्ते निकली है तो
जिस परिवर्तन की राह पर काग्रेस खड़ी है। उसमें तीन राज्यो के जनादेश पहली बार राजनीतिक तौर तरीके भी बदल रहे है और देश का इक्नामिक माडल भी।
साभार, पुण्य प्रसून बाजपेयी

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