जिसकी सामाजिक और नागरिक प्रतिबद्धता ही संदिग्ध हो, उससे गंगा बचाने की उम्मीद करें भी तो कैसे?

0 5
तमाम बातें जो गंगा को लेकर जनसाधारण के बीच लोकप्रिय हैं उनमें से एक है कि गंगा का पानी चाहे जितने दिनों तक घर में रखें, कभी खराब नहीं होता।
इसके पीछे उसकी दिव्यता का तर्क दिया जाता है। औषधीय जड़ी-बूटियों और खनिजों से भरपूर मार्ग का अनुसरण भी इसका एक कारण है। लेकिन आज की परिस्थिति में झांके तो पता लगे कि घर में तो दूर की बात है, गंगा स्वयं गंगा में भी स्वच्छता से कोसों दूर हो गई हैं।
स्नान, कारखानों की गंदगी, धार्मिक अवशिष्ट सामग्रियों का विसर्जन, मूर्तियों इत्यादि का विसर्जन, पशुओं को नहलाना, विभिन्न परियोजनाएं, बांध और बैराज इत्यादि कारकों ने गंगा की पवित्रता और दिव्यता को काफी प्रभावित किया है।
हिंदू रीति-रिवाजों, मान्यताओं और धार्मिक प्रतीकों को प्रमाणित करने के लिए लोग इसे लगातार विज्ञानी तर्कों से संतुष्ट करते रहते हैं। इसी कारण कहा जाता है कि पीपल को पूज्य माना गया ताकि हमेशा ही ऑक्सीजन देने वाले पीपल को कोई काटे नहीं। नीम भी इसीलिए पूजन के योग्य है कि वह एक औषधीय वृक्ष है। गंगा को माँ कहने के पीछे धर्म वैज्ञानिक तर्क देते हैं कि
इससे गंगा संरक्षण के प्रति लोगों की धार्मिक प्रतिबद्धता सुनिश्चित हो सकेगी और गंगा की स्वच्छता के अभियान में सहायता मिलेगी। लेकिन ऐसा है क्या? मौजूदा परिस्थितियों में तो ऐसा कहीं दिखाई नहीं देता। लोगों की लगातार उपेक्षाओं, प्रदूषण और जलाभाव की वजह से सदानीरा कई जगहों पर मृतप्राय दिखती है।
विज्ञान के चरम युग में पहुंचे इंसानों के लिए यह फिलहाल कोई परेशानी का सबब नहीं है। लेकिन पर्यावरण की अतीत की घटनाओं के विश्लेषण और मौसम के बदलते मिजाज को भांपने वाले पर्यावरणकर्मी इससे सिर्फ चिंतित ही नहीं है बल्कि भयभीत भी हैं। उन्हें पता है कि यदि इस प्राकृतिक जीवनरेखा के साथ ऐसे ही दुर्व्यवहार होता रहा तो एक दिन विज्ञान के पास भी मनुष्यता को बचाने के कोई संसाधन शेष नहीं रह जाएंगे। गंगा केवल भारत के सांस्कृतिक इतिहास का प्रवाह नहीं है।
गंगा इस देश के करोड़ों लोगों की जीवन रेखा है। गंगा की स्वच्छता और अविरलता में बाधा पहुंचने से तकरीबन 10 करोड़ की आबादी की खाद्य व्यवस्थाएं प्रभावित होती हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, इस वजह से गंगा की गोद में पलने वाले अनेक जलीय जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर भी भारी संकट आन पड़ा है। दुर्लभ गंगा डॉल्फिन राष्ट्रीय नदी के एक बड़े हिस्से से लगभग विलुप्त हो चुकी है। गंगा की इसी चिंता के प्रति स्वामी निगमनानाद और गुरुदास अग्रवाल उर्फ स्वामी सानंद जागरूक थे। उन्हें गंगा की पर्यावरणीय महत्ता के बारे में ज्ञान था।
वह गंगा को दिल से माँ मानते थे। ये संत गंगा को पहले जैसा देखना चाहते थे। उसका अविरल प्रवाह, उसकी निर्मलता वापस लौटाना चाहते थे। वह गंगा को ‘न्यू गंगा’ नहीं बनने देना चाहते थे। वह गंगा को ‘रिजूवनेट’ करना चाहते थे। उनको पुनर्जीवित करना चाहते थे। उन्हें उम्मीद की किरण दिखी थी जब नयी सरकार के सबसे बड़े मुखिया ने गंगा का नाम लेकर चुनावी ताल ठोंकी थी। गंगा के नाम पर अलग मंत्रालय बनाया था। ‘नमामि गंगे’ परियोजना शुरू की थी।
लेकिन यह उम्मीद तब ध्वस्त हो गयी जब सरकार की स्वयंभू प्राथमिकताओं से गंगा गायब हो गयी। अपने निधन से कुछ दिन पहले एक साक्षात्कार में उनकी निराशा खुलकर सामने आई थी, जब वह नरेंद्र मोदी के बारे में बोलते हुए कह रहे थे कि पहले यह आदमी सही लगा था लेकिन बाद में इसने हम सबको धोखा दिया। उन्होंने कहा कि यह लोग गंगा का नवीनीकरण करने पर तुले हैं। गंगा का नवीनीकरण नहीं करना है बल्कि पुरानी स्थिति बहाल करनी है।
निश्चित रूप से सरकार ने गंगा मामले में काफी उदासीनता दिखाई है। पत्रिका ‘डाउन टू अर्थ’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की देह पर तकरीबन 2525 किलोमीटर लंबी फैली राष्ट्रीय नदी गंगा के लिए सरकार ने अगस्त 2018 तक तकरीबन 236 परियोजनाएं बनाई हैं।
इनमें से केवल 63 परियोजनाएं ही पूरी हुईं। ‘नमामि गंगे’ को मंजूरी मिलने के बाद सीवेज इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में 13 मई 2015 तक 68 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी। इनमें से अगस्त 2018 तक केवल 6 परियोजनाएं ही पूरी हुईं। सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना की कुल लागत तकरीबन 22, 238 करोड़ रुपए है।
वहीं, आरटीआई के माध्यम से ली गई जानकारी पर आधारिक ‘द वायर’ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अब तक ‘नमामि गंगे’ के तहत 22,238 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से कुल 221 परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है। इसमें से 17,485 करोड़ रुपये की लागत से 105 परियोजनाओं को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए मंजूरी दी गई थी, जिसमें से अभी तक 26 परियोजनाएं ही पूरी हो पाई है।
सीवेज के अलावा रिवर फ्रंट बनाने, घाट बनाने, श्मशान घाट के निर्माण तथा नदी के सतह की सफाई संबंधी योजनाओं के लिए 67 परियोजनाओं को प्रस्तावित किया गया था जिनमें 24 परियोजनाएं ही पूरी की जा सकी हैं। गंगा की पूरी तरह से साफ-सफाई के लक्ष्यों की पूर्ति इसकी सहायक नदियों की उपेक्षा कर कभी पूरी नहीं की जा सकती। ऐसे में जब गंगा के लिए ही मंजूर परियोजनाएं अधूरी हैं तब गंगा बेसिन की सहायक नदियों के लिए वांछित परियोजनाओं के बारे में क्या ही कहा जाए?
गंगा भारत की धार्मिक आस्थाओं का भी प्रतिनिधित्व करती है। इसीलिए, समय-समय पर तमाम संतों ने गंगा के लिए अपने स्तर पर संघर्ष किया है। गंगा के लिए ही अनशन कर रहे निगमानंद की सरकारी उपेक्षा के चलते 115 दिनों की भूख हड़ताल के बाद 13 जून 2011 को मृत्यु हो गई थी। सत्ता की ऐसी ही उदासीनता के चलते हमने स्वामी सानंद को भी खो दिया।
जो सरकार गंगा के एक दीवाने बेटे को नहीं बचा सकी हम उससे गंगा को बचाने की उम्मीद अब करें भी तो कैसे? किसी भी नदी को लेकर एक वैज्ञानिक तथ्य है कि वह स्वतः खुद का ‘स्वच्छता अभियान’ होती है। मतलब यह कि अगर उसमें पर्याप्त मात्रा में जलधार हो और पर्यावरणीय प्रवाह बरकरार रहे तो वह अपने आपको स्वयं ही स्वच्छ रखने की योग्यता रखती है। गंगा के साथ मुख्य समस्या यह भी है।
कई जगहों पर बाधित गंगा का पानी कुछ इलाकों में इतना कम होता है कि गर्मी के दिनों में सदानीरा के मध्य रेती में बने टापू पर लोग गाड़ी चलाना सीखते या क्रिकेट खेलते पाए जाते हैं। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में गंगा पर बनी तमाम जलविद्युत परियोजनाएं, नहरों तथा बैराज ने गंगा को काफी नुकसान पहुंचाया है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक गंगा बेसिन पर बने तकरीबन 795 छोटे और बड़े बांध गंगा के प्रवाह में अवरोध पैदा करते हैं। स्वामी सानंद इन्हीं बांधों, जलविद्युत परियोजनाओं तथा बैराजों को गंगा का दुश्मन मानते थे। वह इसी चीज का विरोध कर रहे थे। इसी के लिए उन्होंने आमरण अनशन का प्रण लिया था और अंततः अपने प्राण गंवा दिए थे।
सानंद की कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी। सिर्फ गंगा के लिए एक प्रेम था। वह उसी प्रेम के बदले गंगा को तारने कर अभियान पर निकले थे। वह प्रौद्योगिकी के छात्र थे। तकनीकी के शिक्षक थे। इस तरह के अन्य शिक्षकों की तरह सुखमय जीवन के तमाम संसाधन उनके लिए सुलभ थे। लेकिन उनकी पर्यावरण और गंगा के प्रति प्रतिबद्धता उन्हें चैन से न रहने देती थी।
उन्होंने सरकार से चांद-तारों जैसी कोई मांग नहीं रखी थी। वह कुछेक परियोजनाओं का विरोध कर रहे थे। वह चाहते थे कि भागीरथी, मंदाकिनी, अलकनंदा, पिंडर, धौली गंगा और विष्णु गंगा नदी पर प्रस्तावित जल विद्युत परियोजनाएं रद्द कर दी जाएं।
इसके अलावा गंगा क्षेत्र के वनों की कटान रोकने, खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने तथा 2012 में तैयार ड्राफ्ट के आधार पर संसद में गंगा एक्ट लाने संबंधी अनुरोध उन्होंने सरकार से किए थे। कांग्रेस के समय में भी उन्होंने अनशन किया था। तब स्वामी सानंद राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण के कामकाज से नाखुश थे। सरकार ने उनकी मांगें मान ली थीं।
लेकिन गंगा की तथाकथित रक्षक बनने वाली सरकार में उन्हें गंगा के लिए अपने प्राण गंवाने पड़े। स्वामी सानंद के जाने से किसी के राजनैतिक लाभ-नुकसान का विश्लेषण करना उनके बलिदान का अपमान होगा। हम उनकी मृत्यु के हवाले से किसी सरकार को भी नहीं कोसना चाहते। सानंद चाहते थे कि वह गंगा को ‘न्यू गंगा’ बनते न देखें और उससे पहले प्राण त्याग दें। ऐसा हुआ भी।
उन्होंने कहा था कि दशहरे से पहले वह देहत्याग कर सकते हैं। सरकार को उनकी यह घोषणा बेहद हल्की लगी। उनकी मांगों पर कोई विचार नहीं किया गया। अपुष्ट रूप से एक मंत्री के बयान के बारे में जरूर चर्चा हुई, जिसमें वह उनसे ‘मर’ जाने के लिए कहता है। स्वामी सानंद ‘मर’ गए लेकिन निश्चित रूप से वह उस मंत्री के कहने पर नहीं मरे।

वह इसलिए मरे कि सुविधा और स्वार्थ्य के नाम पर बढ़ते प्राकृतिक दोहन के इस दौर में लोगों को पता चले कि धरती पर कोई ऐसा भी है जो गंगा के लिए अपनी जान भी दे सकता है। कोई ऐसा भी है जो राजनैतिक और निजी स्वार्थों के परे जाकर मानव कल्याण और उससे भी ज्यादा नदी कल्याण के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा सकता है।
स्वामी को मर जाने देने वाली इस सरकार से अब हमें कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। जिसकी सामाजिक और नागरिक प्रतिबद्धता ही संदिग्ध हो उससे हम पर्यावरणीय जिम्मेदारियों के निर्वहन की आशा कैसे करें? इसलिए, इस बलिदान को हमें ही सार्थक करना होगा। हम सभी में से जितने लोग स्वामी सानंद के बलिदान का मतलब समझते हैं, उसका मूल्य जानते हैं,
उसकी प्रतिष्ठा से अवगत हैं, उन्हें गंगा के प्रति अपनी जिम्मेदारियां अब तय कर लेनी चाहिए। जो चीजें सरकार के हाथ में हैं उन्हें छोड़कर उन कर्तव्यों की अनुपालना की ओर बढ़ना चाहिए जो हमारी सक्षमता के दायरे में आती हैं।
हम गंगा प्रदूषण के उन्मूलन की दिशा में काम कर सकते हैं। लोगों को इसे लेकर जागरूक कर सकते हैं। यह प्रो. जीडी अग्रवाल को बेहतर श्रद्धांजलि होगी। हम इस दिशा में अपनी सफलताओं के जरिए सरकार पर उसके अधिकारों के दायरे में आने वाले कदमों के प्रति दबाव बना सकते हैं। पता है कि यह आसान नहीं होगा।
लेकिन, आसान चीज़ों की न तो कहानियां लिखी जातीं हैं और न ही अपनी महानता और दिव्यता के अनुरूप गंगा कोई आसान उपहार ही डिज़र्व करती है। याद रखिए, गंगा जनकल्याण के लिए पृथ्वी पर बहती है, किसी सत्ता के कल्याण के लिए नहीं। इसलिए, अगर उसके उद्धार की जरूरत है तो हमें केवल सत्ता के भरोसे नहीं रहना चाहिए। मशाल खुद भी उठानी चाहिए।

Leave A Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More