भाई-बहन के पवित्र प्रेम का पर्व भाई दूज आज

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लखनऊ,। भाई दूज का त्योहार यह पर्व कार्तिक मास की द्वितीया को मनाया जाता है, इसलिए इसे भ्रातृ द्वितीया भी कहा जाता है। यह पांच दिवसीय दीपावली पर्व की श्रृंखला का अंतिम त्योहार है।
इस दिन बहन भाई का तिलक कर उसके दीर्घायु की प्रार्थना करती है। भाई भी बहन की सुरक्षा का संकल्प लेता है। 
भाई-बहन के खास रिश्ते के लिए रक्षाबंधन की तरह भैया दूज भी मनाया जाता हैै। भाई दूज का त्योहार दीपावली के दो दिन बाद खास रूप से मनाया जाता है। इस दिन अपने भाई को बहनें तिलक कर मिठाई खिलाती हैं।
इस बार भाई दूज पर पूरा दिन ही शुभ है। लेकिन सुबह 9:20 से 10:35 तक बहनें अपने भाइयों को तिलक लगा सकती हैं।
इसके बाद दोपहर 1:20 से 3:15  और शाम 4:25 से लेकर रात 8:40 तक मुहूर्त शुभ बना रहेगा।
बहन चावल के आटे से चौक बनाती है। इस पर भाई को विराजमान कर उसकी पूजा करती है। भाई की हथेली पर चावल का घोल लगाके पान, सुपारी, पुष्प इत्यादि रखकर उसके हाथ पर जल गिराती हैं।
इसके बाद भाई की आरती उतरा कर उसके हाथों में कलावा बांधती है और मिठाई खिलाकर पूजा की विधि संपन्न होती है।
अंत में भाई यदि बड़ा है तो बहन उसका पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं  और यदि भाई अपनी बहन के पैर छूकर आशीर्वाद लेता है।
भगवान सूर्य नारायण की पत्नी का नाम छाया था। उनकी कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ था। यमुना यमराज से बड़ा स्नेह करती थी। वह उससे बराबर निवेदन करती कि इष्ट मित्रों सहित उसके घर आकर भोजन करो।
अपने कार्य में व्यस्त यमराज बात को टालता रहा। कार्तिक शुक्ला का दिन आया। यमुना ने उस दिन फिर यमराज को भोजन के लिए निमंत्रण देकर, उसे अपने घर आने के लिए वचनबद्ध कर लिया।
यमराज ने सोचा कि मैं तो प्राणों को हरने वाला हूं। मुझे कोई भी अपने घर नहीं बुलाना चाहता। बहन जिस सद्भावना से मुझे बुला रही है, उसका पालन करना मेरा धर्म है। बहन के घर आते समय यमराज ने नरक निवास करने वाले जीवों को मुक्त कर दिया।
यमराज को अपने घर आया देखकर यमुना की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने स्नान कर पूजन करके व्यंजन परोसकर भोजन कराया। यमुना द्वारा किए गए आतिथ्य से यमराज ने प्रसन्न होकर बहन को वर मांगने का आदेश दिया।
यमुना ने यमराज से प्रति वर्ष इस दिन घर आने का वचन लिया। साथ ही कहा कि जो भी अपने भाई को आदर सत्कार करके टीका करें, उसे तुम्हारा भय न रहे।
यमराज ने तथास्तु कहकर यमुना को अमूल्य वस्त्राभूषण देकर यमलोक की राह की। इसी दिन से पर्व की परम्परा बनी। ऐसी मान्यता है कि
जो आतिथ्य स्वीकार करते हैं, उन्हें यम का भय नहीं रहता।
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इसीलिए भाई दूज को यमराज तथा यमुना का पूजन किया जाता है।

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