चारो ओर फैले माँस के चीथड़ों में अपनों को तलाश रहे थे परिजन

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अमृतसर, । जोड़ा फाटक पर दर्दनाक हादसा देख लोगों का बुरा हाल था। जिनके घरों के चिराग नहीं मिल रहे थे उनका रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था। जिन्हें अनहोनी का डर सता रहा था वह पागलों की तरह रेल पटरियों पर दौड़ रहे थे।

 

घटनास्थल पर पड़े शवों से कपड़ों के टुकड़े उठाकर अपने वारिसों की पहचान करने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन तेज रफ्तार ट्रेन के पहियों तले बुरी तरह से कुचले गए शरीर परिजन तो क्या किसी से पहचान नहीं जा रहे थे।
रात के अंधेरे में किसी का सिर नहीं मिल रहा था, तो किसी का हाथ। मृतकों के  अंग तलाशने में परिजनों को काफी मुश्किल हो रही थी क्योंकि तेज रफ्तार डीएमयू काफी दूर तक लोगों को घसीटते हुए ले गई थी।

एक मां अपने गुल्लू को तलाशते हुए कभी रो पड़ती तो कभी हंस पड़ती। एक पल के लिए उसे लगता कि रावण तो जल गया और उसका गुल्ल कुछ ही देर में घर पहुंच रहा होगा, यह कहकर वह हंस पड़ती।
वहीं दूसरे पल वह रो पड़ती और कहने लगती कि वह घर बोल कर गया था कि ट्रेन ट्रैक के पास रुक कर जलता रावण देख लेगा। कभी उसे आसपास के लोग समझाते कि
वह घर चली जाए, लेकिन वह नहीं जा रही थी क्योंकि उसे अपने गुल्लू की तलाश थी। गुल्लू उसे देर रात तक कहीं नहीं मिला।
जोड़ा फाटक में हादसे के बाद 150 से ज्यादा खून से लथपथ हुए लोग रेल ट्रैक और उसके आसपास पड़े पत्थरों पर बुरी तरह से तड़प रहे थे। ट्रैक के आसपास स्थित घरों की छतों पर मौजूद लोगों ने तुरंत प्रशासन को घटना की जानकारी दी।
देखते ही देखते सारे शहर की एंबुलेंस घटनास्थल पर पहुंच गईं। अस्पतालों में हूटर बजाती एंबुलेंस आती रहीं और जाती रहीं। एंबुलेंसों में एक-एक कर शव उतारे जाते। क्षत-विक्षत शवों को देखकर डॉक्टर भी विचलित हो गए। 
हादसे में अपना 15 वर्षीय पोता गंवा चुके तरसेम सिंह ने बताया कि पोता सुबह से जिद कर रहा था कि मैं दशहरा देखने जाऊंगा। मैं उसे मना कर रहा था, पर चार बजे वह चुपचाप घर से निकल गया।
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शाम साढ़े सात बजे मुझे पता चला कि रेलवे ट्रैक पर ट्रेन के नीचे आकर लोग दब गए हैं। मैं डर गया। मैैं दौड़े-दौड़े रेलवे ट्रैक पर पहुंचा तो वहां पोते की लाश मिली।

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