ओजोन परत के बिना समाप्त हो जाएगा पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व

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पिछले ही महीने संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल यानी आईपीसीसी की एक रिपोर्ट में तापमान में डेढ़ और दो डिग्री वृद्धि की स्थितियों का आकलन किया गया था, जिसके बाद इसे डेढ़ डिग्री तक सीमित रखने की आवश्यकता महसूस की जा रही है और अब उम्मीद जताई जा रही है कि
अगले माह ‘कान्फ्रेंस आॅफ पार्टीज’ की पोलैंड में चौबीसवीं बैठक में दुनिया भर के देशों पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के नए लक्ष्य घोषित करने का दबाव होगा। जहां तक भारत की बात है, तो इसने 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की तीव्रता में पैंतीस फीसद तक कमी लाने का लक्ष्य रखा है, पर
जी-20 देशों के जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपायों की समीक्षा पर आधारित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत सहित जी-20 देशों ने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के जो लक्ष्य निर्धारित किए हैं, वे तापमान वृद्धि को डेढ़ डिग्री तक सीमित करने के लिहाज से पर्याप्त नहीं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अपेक्षित परिणाम हासिल करने के लिए इन देशों को अपने उत्सर्जन को आधा करना होगा।
इस बात पर भी चिंता व्यक्त की गई कि जी-20 देशों की जीवाश्म र्इंधन पर निर्भरता कम नहीं हो रही है, जहां अब भी करीब बयासी फीसद जीवाश्म र्इंधन ही इस्तेमाल हो रहा है और चिंताजनक बात यह मानी गई है कि कुछ देशों में जीवाश्म र्इंधन पर सब्सिडी भी दी जा रही है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जी-20 देशों में औसतन चौबीस फीसद नवीन ऊर्जा का उत्पादन हो रहा है, जबकि भारत में यह उत्पादन सोलह फीसद ही है। भारत ने हरित ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य 2027 तक सौंतालीस फीसद रखा है और 2030 तक सौ फीसद इलेक्ट्रिक वाहनों के उत्पादन का भी लक्ष्य है।
नवीन ऊर्जा के इन लक्ष्यों के लिए रिपोर्ट में भारत की सराहना भी की गई है। हालांकि ‘क्लाईमेट ट्रांसपेरेंसी’ द्वारा जारी एक अन्य रिपोर्ट में चिंताएं व्यक्त करते हुए कहा गया है कि भारत द्वारा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन फिलहाल करीब 24.54 लाख टन है, जो
2030 तक करीब दोगुना बढ़ कर 45.70 लाख टन तक पहुंच जाएगा, जो तापमान में दो डिग्री वृद्धि के परिदृश्य से भी कहीं ज्यादा है।
आज जलवायु परिवर्तन के चलते विनाश का जो दौर देखा जा रहा है, उसके लिए काफी हद तक ओजोन परत का क्षरण मुख्य रूप से जिम्मेदार है और हमें अब यह भी भली-भांति समझ लेना चाहिए कि हमारी लापरवाही और पर्यावरण से बड़े पैमाने पर खिलवाड़ ही पर्यावरण विनाश की सबसे बड़ी जड़ है। हाल ही में एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों के चलते दुनिया भर में करीब बारह करोड़ लोग विस्थापित होंगे।
ओजोन परत के सुरक्षित न होने से मनुष्यों, पशुओं और यहां तक कि वनस्पतियों के जीवन पर भी बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय है। यही नहीं, अधिकतर वैज्ञानिकों का मानना है कि ओजोन परत के बिना पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा और पानी के नीचे का जीवन भी नहीं बचेगा।
ओजोन परत की कमी से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है, सर्दियां अनियमित रूप से आती हैं, हिमखंड गलना शुरू हो जाते हैं और सर्दी की तुलना में गरमी अधिक पड़ती है, पर्यावरण का यही हाल पिछले कुछ वर्षों से हम देख और भुगत भी रहे हैं।
दरअसल, ओजोन परत में क्षरण और चौड़े होते जा रहे छिद्र के कारण पृथ्वी तक पहुंचने वाली पराबैंगनी किरणें हमारे स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र पर बहुत हानिकारक प्रभाव डालती हैं। ओजोन परत की कमी से हमारे स्वास्थ्य के लिए कितने गंभीर खतरे उत्पन्न हो रहे हैं, इनका अनुमान इसी से सहजता से लगाया जा सकता है कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता क्षीण होना, आंखों में कैटरेक्ट होना, त्वचा कैंसर आदि के मामले बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं।
यही नहीं, जीवनरक्षक टीकों की उपयोगिता भी इसी कारण कम होती जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर सूर्य से आने वाली सभी पराबैगनी किरणें पृथ्वी पर पहुंच जाएं तो पृथ्वी पर सभी प्राणी कैंसर जैसी भयानक बीमारियों से पीड़ित हो जाएंगे, सभी पेड़-पौधे नष्ट हो जाएंगे।
सबसे पहले यह जान लेना जरूरी है कि ओजोन परत है क्या और पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए यह कितनी महत्त्वपूर्ण है। हमारे ऊपर के वातावरण में विभिन्न परतें शामिल हैं, जिनमें एक परत स्ट्रैटोस्फियर है, जिसे ओजोन परत भी कहा जाता है। ओजोन गैस प्राकृतिक रूप से बनती है।
यह ऑक्सीजन के तीन परमाणुओं से मिल कर बनने वाली गैस है, जो वातावरण में बहुत कम मात्रा में पाई जाती है। निचले वातावरण में पृथ्वी के निकट ओजोन की उपस्थिति प्रदूषण बढ़ाने वाली और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक लेकिन
ऊपरी वायुमंडल में ओजोन की उपस्थिति पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए अत्यावश्यक है। जब सूर्य की किरणें वायुमंडल में ऊपरी सतह पर ऑक्सीजन से टकराती हैं, तो उच्च ऊर्जा विकरण के कारण इसका कुछ हिस्सा ओजोन में परिवर्तित हो जाता है।
ओजोन परत वातावरण में बनती है। जब सूर्य से पराबैंगनी किरणें ऑक्सीजन परमाणुओं को तोड़ती है और ये परमाणु ऑक्सीजन के साथ मिल जाते हैं, तो ओजोन अणु बनते हैं। ओजोन परत पृथ्वी के धरातल से बीस-तीस किमी की ऊंचाई पर वायुमंडल के समताप मंडल क्षेत्र में ओजोन गैस का एक झीना-सा आवरण है।
यह परत पर्यावरण की रक्षक मानी गई है, क्योंकि यही वह परत है, जो पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर आने से रोकती है। ओजोन परत सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों के लिए एक अच्छे फिल्टर के रूप में कार्य करती है। सूर्य विकिरण के साथ आने वाली पराबैगनी किरणों का लगभग निन्यानबे फीसद भाग ओजोन मंडल द्वारा सोख लिया जाता है,
जिससे पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी और वनस्पति सूर्य के तेज ताप और विकिरण से सुरक्षित हैं और इसी कारण ओजोन परत को सुरक्षा कवच भी कहा जाता है। यही कारण है कि प्राय: कहा जाता कि ओजोन परत के बिना पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
मांट्रियल संधि का एक प्रमुख उद्देश्य था ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले करीब सौ रसायनों का उपयोग धीरे-धीरे करके खत्म करना और यह अच्छी बात है कि इनमें से कई रसायनों का उपयोग बंद भी किया जा चुका है, पर अब भी ऐसे कई रसायनों का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है, जो ओजोन परत को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं।
यह जान लेना बेहद जरूरी है कि ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने में कौन से मानव निर्मित रसायन सर्वाधिक जिम्मेदार हैं। क्लोरो फ्लोरो कार्बन, मिथाइल क्लोरोफॉर्म, ब्रोमाइड, हेलोन, हाइड्रो क्लोरो फ्लोरो कार्बन, मिथाइल ब्रोमाइड, हाइड्रो ब्रोमो फ्लोरो कार्बन,
ब्रोमो क्लोरो फ्लोरो मीथेन, कार्बन टेट्रा क्लोराइड आदि ओजोन परत के लिए अत्यंत घातक साबित हो रहे हैं, जिनका आजकल एयरकंडीशनर, रेफ्रिजरेटर तथा इसी प्रकार के अन्य कई संयंत्रों में बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है।
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अगर हमें हमारी भावी पीढ़ियों को ओजोन परत की कमी के भयावह दुष्प्रभावों से बचाना है तो इस दिशा में सार्थक कदम उठाने ही होंगे और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों को बढ़ावा देना होगा।

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