Darkness of questions and loss of media
GDP, बेरोज़गारी, बीमारी पर जनता की चुप्‍पी का राज़ 200 सीटों में छुपा है!
पिछले हफ्ते सामने आया कि अप्रैल से जून के बीच भारत की अर्थव्यवस्था 24 फीसदी कम हो गयी है. आशंका यह भी व्यक्त की जा रही है कि अगली तिमाही यानी जुलाई से सितंबर के बीच की जीडीपी में भी गिरावट ही आएगी न कि वह बेहतर हो पाएगा. प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्रियों के चेहरे पर इसके बावजूद कोई शिकन नहीं दिख रही है|
चीन ने भारत की ज़मीन पर कब्जा कर लिया है, लेकिन प्रधानमंत्री मन की बात करते हुए कहते हैं कि हमारी एक इंच ज़मीन भी किसी के कब्जे में नहीं गयी है. बाद में रक्षा मंत्रालय बताता है कि हां, चीन हमारी सीमा में घुस आया है जिस पर हम बातचीत कर रहे हैं. आज भी चीन के साथ छिटपुट झड़पें लगातार हो रही हैं. राजनाथ सिंह रूस में डटे हुए हैं, चीन को पीछे हटाने के लिए तरह-तरह के प्रयास किये जा रहे हैं, लेकिन सरकार इस बात पर अड़ी हुई है कि चीन के साथ सब कुछ ठीक है.
इसी तरह आजकल हर दिन कोरोना से संक्रमित लगभग एक लाख मरीज़ भारत में पाये जा रहे हैं, लेकिन इसकी सूचना बहुत मुश्किल से मिलती है जबकि कोरोना से मरने वालों की संख्या 70 हजार से आगे चली गयी है लेकिन सरकार की भूमिका पर कोई सवाल नहीं है. उल्टे सामान्य लोगों का यह कहना है कि अगर मोदी जी प्रधानमंत्री नहीं होते तो मरने वालों की संख्या अभी तक दस लाख से अधिक हो गयी होती!
सरकार में फिर से आने के बाद प्रधानमंत्री ने 5 ट्रिलियन डॉलर का नारा दिया और कहा था कि भारत ‘विश्वगुरु बनने की तैयारी’ कर रहा है, लेकिन जनता के मन में इसको लेकर कोई सवाल नहीं है.
आज़ाद भारत के इतिहास में हमारी अर्थव्यवस्था इतने ख़राब हाल में कभी नहीं आयी, फिर भी सामान्य जनता में इसको लेकर कोई सवाल नहीं है|.
सवाल है कि ऐसा कैसे हुआ या हो रहा है? क्या कारण है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी बुरी तरह बैठ गयी है, करोड़ों लोग बेरोजगार हो गये हैं, शिक्षा व्यवस्था चौपट हो गयी है, कृषि को छोड़कर हर क्षेत्र लगातार नीचे जा रहा है, पेट्रोल दुनिया में सबसे महंगा भारत में बिक रहा है, लेकिन जनता में किसी बात को लेकर अंसतोष नहीं दिखायी पड़ रहा है?
इसका कारण मीडिया का सरकार के सामने नतमस्तक हो जाना है. लगभग 25 वर्षों से मीडिया में होने के बाद मुझे दो साल पहले पता चला कि मीडिया इतना ताकतवर है या हो सकता है. दो साल पहले तक मुझे हमेशा लगता था कि मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण है लेकिन इतनी महत्वपूर्ण नहीं कि उसे हर बात के लिए इतना भाव दिया जाय.
उदाहरण के लिए, मनमोहन सिंह के कार्यकाल को लिया जा सकता है. उनके दस साल के कार्यकाल के पहले दौर में बेरोजगारी और महंगाई का हाल तो बुरा था ही, लेकिन जीडीपी लगातार ऊपर जा रहा था. हां, कभी-कभार ऐसा होता था कि जीडीपी उस रूप में तेजी नहीं दिखाता था जिस रूप में दिखना चाहिए, फिर भी इसका असर यह जरूर होता था कि 24 घंटे के खबरिया चैनल (जो तब तक इंटरटेनमेंट चैनल नहीं बने थे) कई दिनों तक उसे उस रूप में पेश करते थे जैसे कि जीडीपी ही विकास का एकमात्र पैमाना हो. और टीवी व अखबारों के द्वारा देश की बहुसंख्य जनता इस बात को जान जाती थी कि क्या ‘अच्छा’ हो रहा है! यह भारतीय टीवी चैनलों का प्रिय शगल था जिसमें विकास के भीतर छाते जा रहे अंधेरे का जिक्र सामान्यतया नहीं होता था.
धीरे-धीरे वक्त बदलता गया और अन्ना आंदोलन के समय सरकार के समानांतर मीडिया खड़ा हो गया. अगर 2012-14 के टीवी चैनलों का हाल देखें तो हर दिन मनमोहन सिंह की सरकार टीवी चैनलों के स्टूडियो में रहम की भीख मांग रही होती थी, जिसमें सभी के सभी भाजपानीत विशेषज्ञ बैठा दिये जाते थे, जो सरकार के हर निर्णय को स्टूडियो में खारिज कर दिया करते थे. इसका परिणाम यह हुआ कि मनमोहन सिंह की सरकार जब 2014 में लोकसभा का चुनाव लड़ने गयी तो उसकी विश्वसनीयता लगभग शून्य हो चुकी थी. बीजेपी ने सत्तापक्ष को न सिर्फ टीवी स्टूडियो में हरा दिया था बल्कि सरकारी दलों का मनोबल भी ऐसा तोड़ दिया था कि कई मंत्रियों ने चुनाव लड़ना भी मुनासिब नहीं समझा.
बीजेपी के सत्ता में आने के बाद टीवी चैनल और अखबार मोदीजी से इतने इतने अभिभूत थे कि वे सरकार से सवाल पूछने के बजाय विपक्षी दलों से सवाल पूछने लगे. इसका परिणाम यह हुआ कि विपक्षी दलों की रही-सही साख़ भी खत्म होने लगी. चूंकि सरकार के ऊपर सवाल उठाये ही नहीं जा रहे थे इसलिए उसकी साख़ लगातार बरकरार रही. इसका परिणाम यह हुआ कि जब बीजेपी फिर से 2019 में चुनाव लड़ने गयी तो उसके सामने उस विपक्ष के उठाये कुछ सवाल थे जिसकी विश्वसनीयता नहीं के बराबर कर दी गयी थी. चूंकि विपक्षी दलों की विश्वसनीयता थी नहीं और सरकार के ऊपर प्रश्नचिह्न भी नहीं था, परिणामस्वरूप जनता की तरफ से अगर कोई सवाल था भी तो उसकी दिशा तय नहीं थी. इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी को पिछले चुनाव के मुकाबले लगभग 20 सीटों का लाभ हुआ और यह संख्या 303 तक पहुंच गयी.
सवाल है कि ऐसा कैसे हुआ? हिन्दी प्रदेश (बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा) की लोकसभा की सभी सीटों को मिला दिया जाय तो कुल 221 सीटों में बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के पास कुल 200 सीटें हैं जबकि कांग्रेस के पास 4, सपा के पास 6, बसपा के पास 10 और झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास 1 सीट है. इन्हीं प्रदेशों में कई ताकतवर क्षेत्रीय राजनीतिक दल हैं- बसपा, सपा, राजद, जेएमएम, लेकिन इनमें से किसी भी राजनीतिक दल के पास अपना मुखपत्र तक नहीं है जिससे कि वे अपने समर्थकों से भी संवाद स्थापित कर सकें.
वे अपने समर्थकों से संवाद स्थापित करने के लिए भी मुख्यधारा के कॉरपोरेट मीडिया पर पूरी तरह निर्भर हैं, जो कि पूरी तरह केन्द्र सरकार के दबाव में काम कर रहा है. केन्द्र सरकार के दबाव में काम करने की एक प्रमुख वजह यह भी है कि कोई भी मीडिया घराना सिर्फ मीडिया के धंधे में नहीं है बल्कि उन घरानों के और भी कई बिजनेस हैं. उन्‍हें अपने अन्य बिजनेस को सुरक्षित भी रखना पड़ता है.
अगर इस सवाल को दूसरे रूप में देखें, तो हम पाते हैं कि जहां कहीं भी किसी भी राजनीतिक दल ने अपनी निर्भरता कॉरपोरेट मीडिया से हटाकर अपने मीडिया संस्थानों पर कर ली है, उसकी हालत वहां इतनी खराब नहीं है. महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश व तेलंगाना को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है. महाराष्ट्र में शरद पवार व शिवसेना ने अपना मीडिया हाउस खड़ा किया है. शरद पवार ‘सकाल’ और शिवसेना अपने ‘सामना’ के द्वारा न सिर्फ अपने समर्थकों से संवाद स्थापित करते हैं बल्कि अपनी बात कहने के लिए मुख्यधारा के मीडिया पर बिल्कुल निर्भर नहीं हैं. उसी तरह जगन मोहन रेड्डी व चन्द्रशेखर राव को भी अपनी बात कहने के लिए किसी दूसरे मीडिया की जरूरत नहीं है.
यही हाल डीएमके और एआइडीएमके का है. इन दोनों राजनीतिक दलों के पास अपने चैनल व अखबार हैं जहां से वे अपने समर्थकों को संबोधित कर लेते हैं. चूंकि वे नेता और उनके समर्थक कॉरपोरेट मीडिया पर आश्रित नहीं हैं इसलिए मोदी की छवि इतनी आदमकद की नहीं हो सकी है जितना कि हिन्दी प्रदेशों में नरेन्द्र मोदी की छवि बना दी गयी है.
इस पूरे प्रकरण में मुझे वह घटना याद है जब 2014 में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे. उनके प्रधानमंत्री बनने के छह महीने के भीतर ही झारखंड में चुनाव था जहां के मुख्यमंत्री उस समय हेमन्त सोरेन थे. जिस दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी झारखंड में किसी सभा को संबोधित करने आते थे, उस दिन सभी अखबारों के पहले पेज पर सिर्फ बीजेपी का विज्ञापन होता था. इतना ही नहीं, चुनाव के दिन भी हर अखबार में सिर्फ बीजेपी का विज्ञापन होता था. मुख्यमंत्री सोरेन चाहते थे कि उनकी पार्टी जेएमएम का भी पहले पेज पर विज्ञापन आये, जिसके लिए वह पैसा भी खर्च करने को तैयार थे, लेकिन ऐसा वह चाहकर भी नहीं कर पाये क्योंकि बीजेपी ने सभी अखबारों का पहला पेज पहले ही खरीद लिया था!
उस चुनाव में हेमन्त सोरेन ने बेहतर प्रदर्शन जरूर किया था लेकिन उनकी पार्टी बीजेपी से चुनाव हार गयी थी. वैसे चुनाव के बाद सुना था कि हेमन्त सोरेन ने वादा किया था कि वह अपना मीडिया हाउस खड़ा करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. सुखद संजोग है कि वह फिर से मुख्यमंत्री बन गये हैं लेकिन अगर उनके पास कोई मीडिया हाउस होता तो उनका सांसद नहीं, हो सकता है कि कुछ और सांसद लोकसभा में होते!
इसलिए जब तक टेलीविजन चैनलों व अखबारों में सरकार के खिलाफ खबर न आये- भले ही वे वैकल्पिक चैनल व अखबार हों- तब तक मोदीजी की छवि आदम से महाआदम बनती जाएगी और उसे चुनौती देना इतना ही मुश्किल होता जाएगा. अंततः इस बेरोजगारी और गरीबी के दौर में कामगारों के पास सूचना का एकमात्र साधन सिर्फ और सिर्फ टीवी चैनल या हिन्दी अखबार ही हैं, जिन्‍होंने अपने आर्थिक हित को सुरक्षित करने के लिए सरकार की इच्छा पर विपक्षी दलों के नेताओं को खलनायक बना दिया है. जब तक इस मोर्चे पर काम नहीं होगा, मोदीजी की छवि ‘लार्जर दैन लाइफ’ बनी रहेगी और विपक्षी दल लगातार कमजोर होते जाएंगे|
जितेन्द्र कुमार

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