Flood swept development in Bihar
नीतियों की बनावट में कभी उतर नहीं पाता. तभी तो साल बदलते जाते हैं, लेकिन बिहार,जैसे राज्यों में बाढ़ से तबाही की कहानी नहीं बदलती. टूटते तटबंध, खतरे के निशान को लांघता नदी का पानी, किसी ऊंचे ठीहे की खोज में जान बचा कर भागते लोग, पानी में डूबती फसलें, दाना-पानी को तरसते मवेशी. अखबार के पन्ने और टीवी के परदे पर जान-माल के नुकसान की खबरों के बढ़ते जाने के साथ-साथ जन-प्रतिनिधियों द्वारा बाढ़-प्रभावित इलाकों में हवाई सर्वेक्षण और फौरी राहत की बातें! आखिर, बाढ़ का पानी अपनी ताकत भर नुकसान करके उतर जाता है. कुछ लोग अपने घर-बार और रोजी-रोजगार से हमेशा के लिए उजड़ कर कहीं और पलायन कर जाते हैं, जबकि ज्यादातर लोग बिखरी हुई हिम्मत समेट कर फिर से जिंदगी की शुरुआत करने की कोशिश करते हैं.
शासन के गलियारे से लेकर गांव के चौबारे तक यही मान लिया जाता है कि बाढ़ कुदरत का प्रकोप है और इससे बच पाना बहुत मुश्किल. यह भी मान लिया जाता है कि राज और समाज ऐसी विपत्ति में बस राहत और बचाव के ही काम कर सकते हैं, बाढ़ पर नियंत्रण नहीं. राहत-बचाव का मसला ही बाढ़ पर होनेवाली सार्वजनिक चर्चा की धुरी बन जाता है. लोग अपने सूबे की सरकार को कोसते हैं और सूबे की सरकार केंद्र सरकार को उलाहना देती है. लेकिन, इस मूल बात पर चर्चा नहीं हो पाती है कि बाढ़ प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव-निर्मित आपदा है.
देश के एक-तिहाई हिस्से में बाढ़ से तबाही की कहानी इस बार भी कमोबेश ऐसी ही है,भविष्य में जानो-माल के ऐसे भयावह नुकसान से बचने का एकमात्र उपाय यह है कि इस आपदा को लेकर सरकार एक स्पष्ट नीति बनाने पर गंभीरता से काम शुरू करे. नदियों पर बने बांध-बराजों के कारण नदी में गाद जमा होने, मिट्टी के टीले बनने, तटबंधों और कगारों के टूटने जैसी समस्याओं का समाधान जरूरी हो गया है. गंगा और कोसी जैसी नदियां तेजी से अपना रास्ता बदलती हैं. इस बाबत उपलब्ध अध्ययनों और सुझावों को अमलीजामा पहनाने की जरूरत है. शहरों के लगातार बढ़ते जाने और नदियों में कचरा डालने तथा तटीय क्षेत्रों में निर्माण कार्यों से भी नदियों की प्रवृत्ति पर नकारात्मक असर पड़ा है.
दरअसल, नदी को जीवन व्यवस्था का अभिन्न अंग मानने की जगह हम उसे पानी की आपूर्ति करनेवाली एक प्रणाली मान बैठे हैं. यह मानसिकता आत्मघाती है. कुछ महीने पहले सूखे के मामले पर सर्वोच्च न्यायालय में केंद्र सरकार ने बताया था कि उसके पास सूखे से निबटने की कोई नीति नहीं है.
अफसोस की बात है कि बाढ़ के साथ भी यही मुश्किल है.दरअसल, बिहार में विकास कितना हुआ, सवाल ये नहीं है। विकास का मन और वातावरण बनना भी बड़ी बात है। 15 वर्षो के विकास की गिनती कराने के लिए सरकार की झोली में अब बहुत कुछ है।मान लेते है कि बिहार में विकास हो रहा है। अभी बहुत कुछ करना बाकी है। विकास के औजारों की जंग छुड़ाना कठिनतर टास्क रहा है। जंग एक दिन में नहीं लगती। एक दिन में छूटती भी नहीं। अफसरों के खाली बैठे रहने का अभ्यास छुड़ाना होगा। जनता को विकास में भागीदार बनाना होगा।

 

WRITTEN BY-:आशुतोष मिश्रा(बिहार)

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