बिहार जाति आधारित राजनीति
भारत में  का इतिहास सबसे विविध में से एक है। प्राचीन बिहार, जो कि मगध के रूप में जाना जाता था, 1000 वर्षो तक शिक्षा, संस्कृति, शक्ति और सत्ता का केंद्र रहा।इतिहास इस बात का साक्षी है कि बिहार बहुत ही लंबे समय से राजनीति के केंद्र में रहा है। इसे इसी तथ्य से समझा जा सकता है कि पिछले सात दशकों में भारत में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव हुए हैं, बिहार की धरती उसकी जननी रही है।बिहार की राजनीति हमेशा से अलग रही है. यहां की राजनीति में जाति का गणित काफी अहम है और एक कड़वी सच्चाई है कि चुनाव के अंतिम दिन विकास पर जाति का समीकरण भारी पड़ता है.इसलिए राजनीतिक दल इसी जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर उम्मीदवार उतारते हैं.
.बिहार चुनाव में सारे दल दांव-पेंच की राजनीति में दिलोजान से जुटे हैं. जितने नेता उतनी बातें. विकास, जंगलराज, मंडल, कमंडल के जुमले आम हो गए हैं. हर रैली में विकास की बात होती तो है लेकिन निशाना जाति पर ही होता है. चुनावी बिसात पर सबकी गोटी लाल हो इस आस में सबने जाति के हिसाब से अपने मोहरे सजाए हैं. हालत ये हो गई है कि अब हर दल का नेता भीड़ में खड़ा होकर खुद को कभी राम तो कभी कृष्ण तो कभी सम्राट अशोक का वंशज बताकर वोटरों के सामने अपनी झोली फैलाने में लगा है. बिहार की राजनीति का विशलेषण करने वालों के मुताबिक हर दशक में अलग-अलग जातियां चुनावी दिशा को तय करती हैं.विकास की किसी भी अवधारणा का जाति या मजहब से जोड़ा जाना किसी भी दृष्टिकोण से जायज नहीं है, लेकिन बिहार में ऐसा नहीं है l हरेक पार्टी एक खास जाति को साथ लेकर चलती है और ज्यादातर मामलों में उसी जाति को सहयोग देती नजर आती हैl ऐसा यहां एक पार्टी नहीं बल्कि सभी पार्टियां करती हैं l हरेक पार्टी सार्वजनिक तौर से तो ये कहती नजर आती है
कि “हम जातिवाद से परे हैं”, लेकिन बिहार की राजनीति को देखते हुए लगता है कि यहां बिना जाति के राजनीति हो ही नहीं सकती,वैसे तो देश के तकरीबन हर प्रांत में चुनाव के वक्त उम्मीदवारों के चयन में जाति को ध्यान में रखा जाता है, पर बिहार में कई सीटों की उम्मीदवारी सिर्फ और सिर्फ जाति के आधार पर तय होती है l उम्मीदवारों के चयन का आधार सिद्धांत या सामाजिक क्रियाकलाप पर ना कर के सिर्फ और सिर्फ जाति के आधार पर करना बिहार की राजनीति का सबसे दुखद पहलू है l मेरे विचार में जाति आधारित राजनीति का उद्देश्य सत्ता में बने रहने और अपना राजनैतिक अस्तित्व बरकार रखने तक ही सीमित है l जिसका विकास और जन-कल्याण से कोई सरोकार नहीं है l लेकिन बिहार के राजनीतिक तबके को आज भी अपने हितों की पूर्ति हेतू एक ही कारगर उपाय दिखता है‘जाति आधारित राजनीति“l जाति रहित राजनीति का मुद्दा बिहार के किसी भी राजनीतिक दल के वास्तविक एजेंडे में नहीं है
जातिगत समीकरणों का उन्मूलन आज समय की मांग है और इस सिद्धांत व नीति को सामाजिक-राजनीतिक जीवन में लागू किए बिना राजनीतिक शुचिता की बातें करना केवल और केवल ढोंग हैlबिहार के संदर्भ में हरेक राजनीतिक दल या महत्वपूर्ण राजनेता अपने राजनीतिक हितों को पोषित करने के लिए जातिगत खेमों पर ही आश्रित दिखता हैl ऐसे में समाज का सबसे अहम वर्ग यानी आम जनता सुविधाओं से वंचित नजर आता है l वोट- बैंक की खातिर हर क्षेत्र से टिकट देते समय हरेक पार्टी जाति का अहम ध्यान रखती हैlबिहार में विकास के कार्यों का निष्पादन जातिगत समीकरणों को ध्यान में रखकर किया जाता रहाl बिहार का हरेक राजनीतिक तबका यह बात तो कहता है कि अगर वह सत्ता में आएगा तो राज्य से पलायन जरूर खत्म या कम कर देगा
लेकिन सालों से यहां की जनता जिस तरह अपने राज्य को छोड़कर जा रही है, उससे यह अनवरत जारी प्रकिया बिना किसी सार्थक पहल के खत्म हो जाए इसकी उम्मीद कम ही हैl
बिहार की राजनीति में लगभग हरेक जाति के अपने-अपने बाहुबली नेता हैं और ऐसे बाहुबली नेता सभी राजनीतिक पार्टियों की जरूरत हैं l इसी तर्ज पर इन बाहुबली नेताओं को चुनावों में राजनीतिक दलों के द्वारा जातिगत समीकरणों को ध्यान में रख कर प्रत्याशी भी बनाया जाता हैl मामला साफ है कमोबेश सभी राजनीतिक पार्टियां बिहार में बाहुबलियों का सहारा लेती हैं क्योंकि जातिगत बाहुबल और पैसे की ताकत राजनीति की बिसात में अहम भूमिका जो निभाती है lबिहार में जातिगत राजनीति अब भी हावी है और वोट व जीत का असली आधार यही है l
हालांकि चुनावी मंच से खुलेआम जाति के नाम पर वोट देने की अपील तो बिहार के किसी कोने में नहीं की जाती है लेकिन अपरोक्ष रूप से पूरी चुनावी –राजनीति इसी के इर्द-गिर्द घूम रही है l बिहार की राजनीति में जाति आधारित राजनीति का खेल मंडल कमीशन के दौरान लड़े गए चुनावों के दौरान सबसे सशक्त हुआ था और तब से लेकर आज तक राजनेताओं ने इसे निरंतर मजबूती प्रदान करने का ही काम किया
आशुतोष मिश्रा राष्ट्रीय जजमेंट संवाददाता ✍️

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