सर्वे
भूमाता चैरिटेबल ट्रस्ट के प्रमुख बुद्धाजीराव मुलिक ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “केंद्र सरकार द्वारा बढ़ाई गई सब्सिडी को राज्य सरकार ने कम कर दिया। इसी तरह से राज्य सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य को केंद्र सरकार द्वारा कम कर दिया गया।
केंद्र और राज्य सरकार दोनों किसानों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं। इसका नतीजा यह हो रहा है कि किसान अपनी जिंदगी समाप्त करने को मजबूर हो रहे हैं। वे किसानों को परेशान कर रहे हैं।” हालांकि, मुलिक ने रिपोर्ट के बारे में विशेष जानकारी देने से इंकार कर दिया क्योंकि अभी इसे सदन में पेश नहीं किया गया है।
एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, प्राकृतिक आपदा के साथ-साथ केंद्र सरकार, राज्य सरकार, बैंक और साहूकार सभी मिलकर मराठा समुदाय के किसानों का दम घोंट रहे हैं। ये नतीजे पुणे स्थित भूमाता चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा राज्य में मराठा किसानों की स्थिति का जायजा लेने पर सामने आए।
सर्वे के इस नतीजे को जस्टिस एनजी गायकवाड़ को सौंपा गया, जो स्टेट बैकवर्ड क्लास कमिशन का नेतृत्व कर रहे हैं। उन्होंने इस रिपोर्ट को पिछले हफ्ते राज्य सरकार को दिया है। अब सरकार यह रिपोर्ट विधानसभा में रखेगी।
सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में किसानों की कुल आबादी करीब 1.5 करोड़ है। इनमें से 82 प्रतिशत (1.28 करोड़) मराठा किसान हैं। इन 82 प्रतिशत किसानों में से 78 प्रतिशत बारिश पर निर्भर रहने वाले छोटे और गरीब तबके के किसान हैं। यह आंकड़ा करीब एक करोड़ के आसपास है। औसतन एक परिवार में पांच सदस्य होते हैं।
इस लिहाज से महाराष्ट्र के पांच करोड़ की आबादी वर्षा के पानी से सिंचिंत होने वाली खेती पर निर्भर है। इन किसानों के पास आमदनी का और कोई जरिया नहीं है। इसी खेती के आय से शिक्षा, स्वास्थ्य, शादी, कपड़े, सामाजिक रीति-रिवाज और अन्य मदों के खर्च भी पूरे करने हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च लगातार बढ़ रहा है। पहले की तुलना में स्कूल और कॉलेज जाने वाली लड़कियों की संख्या भी बढ़ी है। यदि एक घर के औसतन दो बच्चे भी स्कूल जाते हैं, तो दो लाख रुपया प्रति महीने खर्च आता है।
रिपोर्ट के अनुसार, 1951 की तुलना में 1961 में कृषि और उससे संबंधित उद्योग के लिए आवंटन को भारत सरकार ने 25 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया। वहीं, महाराष्ट्र सरकार ने इसे 30.87 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया। 
पिछले दो दशक में बैंकों द्वारा कृषि क्षेत्र में लागत मूल्य का मात्र 50 प्रतिशत ही लोन उपलब्ध करवाया गया है। ऐसी स्थित में किसानों के लिए साहूकारों के पास जाने के सिवा अन्य कोई विकल्प नहीं बचता है। साहूकार प्रत्येक वर्ष 24 से 60 प्रतिशत ब्याज वसूलते हैं।
मुलिक, जो कि एक कृषि विशेषज्ञ भी हैं और इस सर्वे रिपोर्ट को ड्राफ्ट किया है, कहते हैं, “कई कारणों की वजह से किसानों द्वारा साहूकारों से कर्ज की रकम लगातार बढ़ रही है। वे कुंआ खुदवाने, खेती से संबंधित मशीन खरीदने जैसे कार्यों के लिए उनसे पैसे लेते हैं और धीरे-धीरे उनके चंगुल में फंस जाते हैं।
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1970 के बाद से कृषि क्षेत्र में लागत बढ़ी है, लेकिन उस अनुपात में बिक्री का मूल्य नहीं बढ़ा है। महाराष्ट्र सरकार ने बाम्बे हाईकोर्ट को बताया था कि 1996 से लेकर 2004 तक राज्य के किसान घाटे में खेती कर रहे थे।”

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