तुलसीराम प्रजापति
2006 में गुजरात में हुए इस एनकाउंटर की जांच कर रहे मुख्य जांच अधिकारी ने बुधवार (21 नवंबर, 2018) को स्पेशल कोर्ट में यह दावा किया है। अप्रैल 2012 से केस की जांच कर रहे संदीप तामगड़े ने कोर्ट को यह भी बताया कि यह राजनेताओं और अपराधियों की साठगांठ का परिणाम था।
इसमें अमित शाह और राजस्थान के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया कथित तौर पर वह राजनेता थे जिन्होंने 2004 में मशूहर बिल्डरों के ऑफिसों में आग लगवाने के लिए सोहराबुद्दीन शेख, तुलसीराम और आजम खान जैसे अपराधियों का इस्तेमाल किया था।
अमित शाह, कटारिया, दिनेश एमएन, राजकुमार पांड्या और वंजारा वह लोग हैं, जिन्हें इस मामले में आरोपी बनाया गया। हालांकि ट्रॉयल कोर्ट ने साल 2014 से 2017 के बीच इस मामले से इन्हें बरी कर दिया।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, आईपीएस अधिकारी दिनेश एमएन, राजकुमार पांड्या और डीजी वंजारा कथित तौर पर तुलसीराम प्रजापति के फर्जी एनकाउंटर के मुख्य साजिशकर्ता थे।
मुख्य जांच अधिकारी संदीप तामगड़े ने यह भी दावा किया है कि आरोपी के कॉल डेटा रिकॉर्ड्स (सीडीआर) से साबित होता है कि उसने ही अपराध की साजिश रची थी। तामगड़े से जब पूछा गया कि क्या किसी सीडीआर की जांच के दौरान साजिश का पता लगा।
उन्होंने सकारात्मक जवाब देते हुए कहा कि क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान अधिकारी इस बात के लिए सहमत हुए कि सीडीआर किसी विशेष समय पर किसी व्यक्ति के स्थान का पता लगाने के लिए सबसे अच्छे सबूत हैं।
जब बचाव पक्ष के वकीलों ने उन लोगों के नाम देने के लिए कहा जिनके सीडीआर में साजिश रची गई। तब तामगड़े ने अमित शाह, दिनेश एमएन, वंजारा, पांड्या, विपुल अग्रवाल, आशीष पांड्या और एनएच दाभी और जीएस राव का नाम लिया। इसमें से पांड्या, दाभी और
राव ट्रायल का सामना कर रहे हैं जबकि दूसरों को साक्ष्य को कमी की वजह से छूड़ दिया गया। सीबीआई ने कथित अपराध से पहले और उसके बाद आरोपियों में इन पुरुषों की कॉल डिटेल शामिल की थी। ट्रॉयल कोर्ट ने तब इन आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि उनके खिलाफ प्रर्याप्त सबूत नहीं हैं।
बता दें कि 28 दिसंबर, 2006 को तुलसीराम की गुजरात में मौत हो गई थी। राजस्थान के पुलिस अधिकारियों का दावा है कि अहमदाबाद कोर्ट में सुनवाई के दौरान वापस उदयपुर जेल ले जाने के दौरान वह हिरासत से भाग गया। सीबीआई का कहना है कि तुलसीराम और सोहराबुद्दीन ने पुलिसकर्मियों और राजनेताओं के साथ मिलकर एक्सटॉर्शन रैकेट चलाया।
जांच एजेंसी के मुताबिक 23 नवंबर, 2005 को सोहराबुद्दीन, उनकी पत्नी कौसरबी और तुलसीराम के अपहरण की साजिश रची गई थी। सीबीआई के आरोपपत्र के मुताबिक 26 नवंबर, 2005 को सोहराबुद्दीन को कथित रूप से आयोजित मुठभेड़ में मारा गया था, लेकिन कौसरबी की भी हत्या कर दी गई थी।
बुधवार को तामगड़े ने कोर्ट को बताया कि जब उन्होंने अप्रैल 2012 में जांच संभाली, तो उनके पूर्ववर्तियों ने सोहराबुद्दीन मामले का एक बड़ा हिस्सा पूरा कर लिया था। उन्होंने कहा कि राजस्थान में एक संगमरमर व्यवसायी कटारिया और विमल पाटनी के बयान दर्ज किए थे।
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जब डिफेंस वकील वहाब रियाज ने पूछा सबूत नष्ट हो गए हैं या उन्हें नष्ट कर दिया गया है। चूंकि जबसे उन्हें बरी किया गया है तब से कोर्ट ने उनसे सवाल पूछने की अनुमति नही दी है।

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