इंसानों ने
मुश्किल यह है कि इंसान को छोड़ कर अन्य सभी जीवों का तेजी से खात्मा हो रहा है और उनके बचे रहने की संभावना दिनोंदिन क्षीण होती जा रही है। वर्ल्ड वाइल्ड फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) और लंदन की जियोलॉजिकल सोसायटी (जेएसएल) ने अपनी रिपोर्ट ‘लिविंग प्लानेट’ में बताया है कि बीते पचास सालों में इंसानों की आबादी दो गुना हो चुकी है,
लेकिन इसी अवधि यानी 1970 से 2014 के बीच रीढ़धारी जीव-जंतुओं की साठ फीसद आबादी खत्म हो गई है। इसमें कोई दोष गायब होने वाले जीवों का नहीं, बल्कि दो गुना हो गए इंसानों का है, जिन्होंने अपने विकास और
अपने स्वार्थ के लिए धरती का इस तरह दोहन किया है कि जल, जंगल, जमीन से लेकर हर संसाधन पर उसका कब्जा हो गया है और शेष जीव-जंतुओं से उनकी रिहाइश, खाना-पीना और माहौल तक छिन गया है।
इससे इनकार नहीं कि इंसान को यह पृथ्वी सभ्यता के आरंभ में जैसी मिली थी, वैसी हमेशा तो नहीं रह सकती थी। विकास की कुछ कीमत तो उसे चुकानी ही थी, अन्यथा आज दुनिया में तरक्की की जो चकाचौंध दिखाई पड़ रही है, उसके दर्शन शायद कभी न हो पाते।
लेकिन मुश्किल वहां पैदा होती है, जब इंसान अपने पैर संसाधनों की चादर से बाहर पसारने और दूसरे जीवों को बाहर धकियाने लगता है। विडंबना है कि बीते पचास सालों में इंसानी लालच की वजह से एक तरफ ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, तो दूसरी तरफ दुनिया में पीने लायक साफ पानी की मात्रा घट रही है,
वनक्षेत्र सिकुड़ रहे हैं, नमी वाले क्षेत्रों (वेटलैंड्स) का खात्मा हो रहा है। संसाधनों के घोर अभाव के युग की आहट के साथ ही हजारों जीव और पादप प्रजातियों के सामने हमेशा के लिए विलुप्त होने का खतरा उत्पन्न हो गया है।
‘लिविंग प्लैनेट’ नामक रिपोर्ट तैयार करने वाले उनसठ विशेषज्ञों के समूह ने अपने अध्ययन में मछली, पक्षी, स्तनधारी, उभयचर और सरीसृप की अलग-अलग करीब चार हजार प्रजातियों को शामिल किया था। यह अध्ययन कहता है कि 2010 तक जीव-जंतुओं के विलोपन का प्रतिशत अड़तालीस तक था, लेकिन बाद में इसमें और रफ्तार आ गई।
इसका अर्थ यह है कि बीते दस वर्षों में ही इंसानी लालच ने धरती पर बाकी जीवों के जीने के हर संसाधन पर या तो खुद कब्जा कर लिया है या उसका इस कदर दोहन किया है कि उनके लिए कुछ नहीं बचा है। पिछले एक दशक में सबसे ज्यादा नुकसान अफ्रीकी हाथियों को हुआ है।
इनकी आबादी एक तिहाई कम हो गई है। इसके बाद दूसरा बड़ा खतरा ताजे पानी में रहने वाले जीवों के लिए पैदा हुआ है, क्योंकि झीलों और नदियों में प्रदूषण काफी तेजी से बढ़ा है। यह प्रदूषण कितना जानलेवा है,
इसका अंदाजा इससे होता है कि इस पूरी अवधि में करीब तिरासी प्रतिशत जलीय जीवों की आबादी खत्म हो गई है और अब इनके हमेशा के लिए विलुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है।
कुछ वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के साझा समर्थन से पंचानबे देशों के अलग-अलग क्षेत्रों के 1360 विशेषज्ञों ने ‘मिलेनियम इकोसिस्टम एसेसमेंट’ (एमए) नामक जो रिपोर्ट तैयार की, उसमें भी यही बात कही गई है।
इस प्रोजेक्ट के मुखिया और विश्व बैंक में मुख्य वैज्ञानिक रॉबर्ट वाटसन के अनुसार, ‘हमारा भविष्य हमारे ही हाथ में है, पर दुर्भाग्य से हमारा बढ़ता लालच भावी पीढ़ियों के लिए कुछ भी छोड़ कर नहीं जाने देगा।’ उनकी रिपोर्ट कहती है कि इंसान का प्रकृति के अनियोजित दोहन के सिलसिले में यह दखल इतना ज्यादा है कि पृथ्वी पिछले पचास वर्षों में ही इतनी ज्यादा बदल गई है,
जितनी कि मानव इतिहास के किसी काल में नहीं बदली। आधी शताब्दी में ही पृथ्वी के अंधाधुंध दोहन के कारण पारिस्थितिकी तंत्र का दो-तिहाई हिस्सा नष्ट होने के कगार पर है। जीवाश्म र्इंधन यानी पेट्रोल-डीजल के बढ़ते प्रयोग और
जनसंख्या-वृद्धि की तेज रफ्तार धरती के सीमित संसाधनों पर दबाव डाल रही है। इस वजह से सिर्फ भोजन का ही नहीं, बल्कि पानी, लकड़ी, खनिजों आदि का भी संकट दिनोंदिन गहरा रहा है।
संसाधनों पर बोझ बढ़ने और जीव-जंतुओं के खात्मे की आशंका के तीन प्रमुख कारण हैं। एक, बढ़ती आबादी के उपभोग के मद्देनजर उनका तेज दोहन। दो, इंसान द्वारा संसाधनों की कमी की पूर्ति का कोई उपाय न करना, जैसे काटे गए जंगलों के स्थान पर नए वृक्ष नहीं लगाना और तीन, प्रकृति को भी संसाधनों की भरपाई का समय नहीं देना।
कुल मिलाकर मामला पृथ्वी पर इंसान के ‘इकोलॉजिकल फुटप्रिंट’ यानी पारिस्थितिकी दोहन की छाप का है, जो हर दिन पहले से बड़ा होता जा रहा है। मानव अपनी जरूरतों के लिए जिस तरह प्रकृति पर आश्रित होता है, उसे विज्ञान की भाषा में इकोलॉजिकल फुटप्रिंट कहा जाता है।
इकोलॉजिकल फुटप्रिंट के नए आकलनों के अनुसार भोजन, पानी तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के हिसाब से धरती पर जैविक उत्पाद्रता के लिए कुल 11.3 अरब हेक्टेयर जमीन और समुद्र उपलब्ध है और यह समूची पृथ्वी का एक चौथाई हिस्सा है।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की रिपोर्ट के मुताबिक आज पृथ्वी के संसाधनों पर प्रति व्यक्ति औसत फुटप्रिंट 2.2 हेक्टेयर क्षेत्रफल घेर रहा है। यानी हमारी जरूरतें इको सिस्टम पर जरूरत से ज्यादा बोझ डाल रही हैं।
अलग-अलग हिस्सों में बांटने से संसाधनों के खर्च की तस्वीर और साफ होती है। जैसे, 1961-2001 के बीच चालीस साल के अंतराल में ही इंसानों के भोजन, फाइबर और लकड़ी की जरूरतों में बयालीस प्रतिशत का इजाफा हुआ।
औद्योगिक विकास और रिहाइश के लिए खेत-जंगल साफ कर डाले गए हैं। अब तो इसके लिए समुद्रों पर डाका डाला जा रहा है। धरती के संसाधनों में सबसे तेज दोहन यानी करीब अट्ठानबे फीसद वृद्धि मछली के उपभोग और 186 फीसद की बढ़ोतरी चरागाहों के उपभोग में हुई। इस कारण 1970 से 2001 के बीच समुद्री जीव-जंतुओं की प्रजातियों में तीस फीसद और ताजे पानी की जीव प्रजातियों में पचास फीसद की गिरावट हुई।
जहां तक प्रदूषण और जीवाश्म र्इंधन के उपभोग का सवाल है, चालीस सालों में तेल फूंकने में हमने सात सौ प्रतिशत की तरक्की की है, जाहिर है, प्रदूषण की रफ्तार भी कुछ ऐसी ही है। कुल मिलाकर मनुष्य ने संसाधनों की छीनाझपटी करते हुए ग्लोब की आधी जमीन कब्जा ली है। इस कारण दुनिया से 484 जीव प्रजातियां और 564 पादप प्रजातियां वर्ष 1600 के बाद से अब तक गायब हो चुकी हैं।
बहरहाल, अब यह समझने का वक्त आ गया है कि इंसान या तो धरती पर अकेले ही रहने को तैयार हो जाए और खाने-पीने के कुछ यांत्रिक इंतजाम कर ले। क्योंकि अगर जीव-जंतु गायब होते हैं, तो परागण से लेकर पूरी खाद्य शृंखला इससे प्रभावित हो सकती है और फल, सब्जी, अनाज तक गायब हो सकते हैं।
यह भी समझना होगा कि आज अगर दूसरे जीव-जंतुओं के सामने विलोपन का खतरा है, तो आगे चल कर खुद इंसान के विलुप्त होने का खतरा पैदा हो जाएगा। अफसोस यह होगा कि तब शायद कोई अन्य जीव-प्रजाति उसे बचाने या उसका दर्द साझा करने को धरती पर मौजूद नहीं होगी।
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इन चेतावनियों से यह तो साफ है कि जितने संसाधन यह पृथ्वी इंसानी आबादी को दे सकती है, इस पर मौजूद अरबों लोगों की भीड़ उससे कहीं ज्यादा संसाधन खींचने लगी है। ऐसे में इस पृथ्वी के खोखले हो जाने और फिर खत्म हो जाने का खतरा पैदा हो गया है।

 

अभिषेक कुमार सिंह

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