2002 गुजरात
दंगों के वक्त मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, जबकि जकिया कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की विधवा हैं। दंगों के दौरान एहसान की हत्या कर दी गई थी। जांच-पड़ताल के लिए इस मामले में बनी स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) ने मोदी और 58 अन्य लोगों को क्लीनचिट दे दी थी।
इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई, लेकिन अक्टूबर 2017 में गुजरात हाई कोर्ट ने इस क्लीनचिट को बरकरार रखा। जकिया और तीस्ता सीतलवाड़ के संगठन सिटिजंस फॉर जस्टिस ऐंड पीस ने सुप्रीम कोर्ट गठित एसआईटी के निष्कर्षों पर सवाल उठाए थे।
गुजरात में साल 2002 में हुए दंगों के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य लोगों को मिली क्लीन चिट के खिलाफ जकिया जाफरी की याचिका पर सोमवार (19 नवंबर) को सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा।
आपको बता दें कि दंगाइयों की भीड़ ने 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसाइटी में हमला करके एहसान और 68 अन्य लोगों को मौत के घाट उतार दिया था।
गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में कारसेवकों को जिंदा जलाने की घटना के बाद वे दंगे भड़के थे। जकिया ने साल 2006 में मांग की थी कि नरेंद्र मोदी, उनके कुछ मंत्रियों और नौकरशाहों के खिलाफ भी पुलिस केस दर्ज किया जाए।
दंगों के दौरान गुजरात सरकार को हालात काबू करने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी थी। नतीजतन राज्य में तीसरे दिन शांति बहाली के लिए भारतीय सेना के जवानों को तैनात किया गया था।
वैसे तो हिंसा की घटनाएं मुख्य रूप से उन्हीं तीन दिनों में हुई थीं, मगर उसके चलते राज्य के विभिन्न इलाकों में तनाव की स्थिति महीनों तक रही थी।
यहां तक कि गुजरात दंगों के बाद आरोप लगे कि राज्य की तत्कालीन सरकार और पूरा तंत्र या तो वहां के हालात संभालने में नाकाम रहा या उसने जानबूझकर अपनी आंखों पर पट्टी बांधे रखी।
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ऐसे में तत्कालीन सीएम मोदी की भूमिका पर भी सवालिया निशान लगे थे।

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