देश के
हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव अमरजीत सिन्हा ने बीते एक नवंबर को राज्य सरकारों को पत्र लिखकर कहा कि जिन लाभार्थियों के आधार नंबरों को सत्यापित नहीं किया जा सका है उसके विशेष प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक सिन्हा ने गरीबों के आंकड़ों के बारे में भी बताया। उन्होंने पत्र में लिखा कि राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम का लाभ पाने के लिए पंजीकृत 2.84 करोड़ लाभार्थियों में से 1.92 करोड़ लाभार्थियों के आधार कार्ड ही लिंक हुए हैं और उनमें से केवल 1.02 करोड़ लाभार्थियों की आधार डिटेल सत्यापित की जा सकी है।
देश के आधे से ज्यादा गरीबों के आधार कार्ड लिंक न होने की वजह से सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुंच रहा है। 50 फीसदी से ज्यादा गरीबों के आधार कार्ड के विवरण की पुष्टि नहीं की जा सकी है।
सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने 12 अंकों के विशिष्ट पहचान वाले आधार नंबर को सरकारी सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं के लिए अनिवार्य किया था। हालांकि, बैंक खाता खोलने और सिम खरीदने के लिए इसे जरूरी नहीं बताया था।
राज्यों के सामाजिक कल्याण सचिवों को लिखे पत्र में सिन्हा ने ध्यान दिलाया कि कुल लाभार्थियों और आधार डिटेल सत्यापित होने वाले लाभार्थियों के बीच अंतर बड़ा हैं जिसे खत्म करने के लिए विशेष प्रयास किए जाने की जरूरत है।
बता दें कि राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) से बुजुर्गों, विधवाओं, दिव्यांगों और गरीब घरों की गर्भवती महिलाओं को सरकारी लाभ मिलता है। अधिकारियों का कहना है कि आधार कार्ड को बैंक या पोस्ट ऑफिस के सेविंग अकाउंट और
बायोमीट्रिक विवरण के लिए देने और राज्य सरकारों द्वारा उसे सत्यापित किए जाने पर लोगों के लिए पेमेंट लेना आसान हो जाता है। सिन्हा ने राज्यों को बिना किसी देरी के लाभार्थियों के आधार सत्यापन को पूरा करने का निर्देश दिया।
रिपोर्ट के मुताबिक सिन्हा ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के साथ बैठकें की गई थीं ताकि महिला स्वयं सहायता समूहों गांवों में लाभार्थियों को पैसे देने के लिए बैंकिंग संवाददाताओं के रूप में नियुक्त किया जा सके।
सिन्हा ने बताया कि जिन जगहों पर बैंकें नहीं हैं वहां 3000 महिला स्वयं सहायता समूहों को बैंक संवाददाता के तौर पर प्रशिक्षित किया जा चुका है।
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जल्द ही 2500 समूहों को और जोड़ा जाएगा। इस वित्त वर्ष के आखिर तक 15 से 20 हजार ऐसे समूह होंगे जिनमें काम करने वाली महिलाएं 8 से 10 हजार रुपये प्रति माह कमा रही होंगी।

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