पति की
महिलाओं द्वारा अपने पति की दीर्घायु एवं स्वास्थ्य की कामना के साथ किया जाने वाला करवाचौथ का निराजल व्रत 27 अक्टूबर शनिवार को किया जाएगा।

 

इस दिन महिलाएं पूरे दिन व्रत करने के पश्चात रात्रि में चंद्रोदय के समय चंद्र देव को अ‌र्घ्य देकर अपना व्रत तोड़ेंगी। करवाचौथ व्रत के मद्देनजर शुक्रवार को बाजार सजे रहे।
देर रात तक व्रती महिलाओं की चहल-पहल बाजारों में रही। सभी ने जरूरत के मुताबिक खरीदारी की।
करवाचौथ का यह व्रत कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की रात्रि व्यापिनी चतुर्थी तिथि में किया जाता है।
आचार्य पंडित शरद चंद्र मिश्र ने बताया कि वाराणसी से प्रकाशित पंचाग के अनुसार 27 अक्टूबर शनिवार को सूर्योदय 6.24 बजे और तृतीया तिथि सायं 7.59 बजे तक है।
तत्पश्चात चतुर्थी तिथि है। चंद्रोदय सायं 7.38 बजे होगा। रोहिणी नक्षत्र दिन में 10.23 बजे से रात्रिपर्यत है। चंद्रमा इस दिन अपनी उच्च स्थिति में रहेगा।
रोहिणी नक्षत्र में चंद्रमा की उपस्थिति अत्यंत शुभ तथा अरोग्यवर्धक मानी जाती है। इसी दिन सायं 7.59 बजे के बाद चतुर्थी तिथि में अ‌र्घ्य दिया जाएगा।
पुराणों के अनुसार जब पांडवों पर घोर विपत्ति का समय आया। तब श्रीकृष्ण के कहने पर द्रोपदी ने यह व्रत रखा और पांडवों का कष्ट दूर हुआ तथा उन्हें पुन: राज्य की प्राप्ति हुई।
एक अन्य कथा के अनुसार एक ब्राह्माण की पत्नी ने विधि-विधान से यह व्रत कर पुन: अपने सुहाग को प्राप्त किया।
एक पीढ़ा (लकड़ी का पाटा) पर जल से भरा एक पात्र रखें। उस जल में चंदन और पुष्प छोड़ें और मिट्टी का एक करवा लेकर उसमें गेहूं और उसके ढकनी में चीनी भर लें और एक रुपये नगद रख दें।
करवा पर स्वास्तिक बनाकर तेरह बिंदी दें और हाथ में गेहूं के तेरह दाने लेकर कथा सुने। तत्पश्चात करवा पर हाथ रखकर उसे किसी वृद्ध महिला का चरण स्पर्श कर अर्पित करें और चंद्रोदय के समय रखे जल से अ‌र्घ्य देकर अपना व्रत तोड़ें।
कुछ महिलाएं दीवार या कागज पर चावल को जल में पीसकर करवाचौथ का चित्र बनाती हैं और उसमें चंद्रमा और गणेश की प्रतिमा उकेरती हैं तथा चावल, गुड़ व रोली से पूजा करती हैं।
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इस दिन महिलाएं भजन व मांगलिक एवं सात्विक कर्मो में व्यतीत करें और सुंदर वस्त्र तथा आभूषण श्रृंगार करके करवा की पूजा करें।

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