सीबीआई
अपनी ही एजेंसी द्वारा घूस केस में फंसने से पहले सीबीआई के नंबर 2 अधिकारी राकेश अस्थाना ने विजय मल्या के देश छोड़ने के मामले में जारी लुक आउट नोटिस का स्तर कम करने के मामले में एक जांच शुरू कर दी थी।
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में कई अधिकारियों सहित एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ सवाल उठने खड़े हो गए थे। इसके अलावा, यह भी संदेह उठने लगा था कि मुंबई पुलिस को नोटिस का स्तर कम करने के बारे में क्यों सूचना दी गई थी,
जबकि यह ब्यूरो ऑफ इमिग्रेश (बीओआई) को सूचित करने के लिए काफी था। लेकिन अस्थाना के खिलाफ भ्रष्टचार का मामला दर्ज हाने के बाद अब यह पूछताछ की कार्रवाई अधर में लटक गई है।
माल्या  केस अस्थाना और उनकी स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम (एसअाईटी) को दिया गया एक हाई प्रोफाइल केस था। अब सीबीआई डॉयरेक्टर ने इस केस से जुड़े सभी मामलों से अस्थाना को हटा दिया है।
रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से यह कहा गया है, लुक आउट नोटिस के स्तर को कम करने का काम गुजरात कैडर के एडिशनल डॉयरेक्टर एके शर्मा की देखरेख में हुआ था। अस्थाना ने एके शर्मा के खिलाफ सीबीआई में अलग से शिकायत की थी।
सीबीआई में बैंक, सिक्योरिटी और फ्रॉड मामले डिविजन को देखने वाले शर्मा, माल्या केस की जांच कर रहे थे। इसके बाद इस मामले को अस्थाना और उनकी टीम को दे दिया गया। एसआईटी ने माल्या मामले को धारा 420 के तहत धोखाधड़ी के रूप में रजिर्स्ड किया था, ताकि 
यूनाइटेड किंगडम में प्रत्यर्पण कार्यवाही शुरू की जा सके। क्राउन अभियोजन सेवा ने बताया था कि प्रत्यर्पण केवल भारतीय और ब्रिटिश कानून दोनों द्वारा मान्यता प्राप्त अपराधों के लिए संभव होगा।
गौरतलब है कि सीबीआई ने आधिकारिक तौर पर लुक आउट नोटिस के स्तर को कम करने की बात स्वीकार की थी, लेकिन किसी भी तरह के गलत आरोपों से इंकार करते हुए इसे ‘इरर ऑफ जजमेंट’ बताया था।
बता दें कि विजय माल्य के खिलाफ 23 नवंबर 2015 को लुकआउट नोटिस के स्तर को कम करते हुए ‘हिरासत में लेने’ की जगह ‘सिर्फ सूचना देने’ के लिए कर दिया गया था। इसका मतलब यह है कि सीबीआई इस मूवमेंट के लिए अलर्ट हो जाए। 
लेकिन माल्या को रोका नहीं जाए। एजेंसी ने दावा किया था कि माल्या जांच के दौरान सहयोग कर रहा था, उसकी गिरफ्तारी जरूरी नहीं थी। जब पहला नोटिस 12 अक्टूबर 2015 को जारी किया गया था, तब माल्या विदेश में था।
माल्या जब नवंबर महीने में भारत लौटे तब ब्यूरो ऑफ इमिग्रेश ने पूछा था कि, “क्या माल्या को हिरासत में ले लिया जाए?” इसके जवाब में सीबीआई ने कहा था कि, “ऐसा करने की जरूरत नहीं है।
यह भी पढ़ें: कोई विकल्‍प नहीं बचा तो संसद में कानून लाकर बनेगा राम मंदिर: केशव प्रसाद मौर्या
उनके खिलाफ किसी तरह का वारंट नहीं है।” 2 मार्च 2016 को देश छोड़ने से पहले माल्या ने कई बार विदेशों की यात्रा की थी। इसके बाद अस्थाना और उनकी एसआईटी टीम को यह केस 6 जून 2016 को दिया गया था।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.