अत्याचार
अत्याचार को सहन करना, कुविचार का श्रवण करना, अपने अधिकार का हनन करना, रावण के शासन को स्वविकार करने के बराबर है।
हरहाल में, हर सांस तक, आखिरी सांस तक अपने लिए लड़ूँगा, बुराई का पैर नहीं पकडूँगा, हिंसा में नहीं जकड़ूंगा, मेरा यह प्रण है प्रण है प्रण है।
नियम नीति नैतिकता कुतर्क पर कुप्रमादिक्ता ,कुकर्म कुधर्म कुरीति ,शोषण और मत प्रीति, ये दश कंठ है, शासक बन गया है, युगो युगो से, अन्याय है उसकी रगों में
विराट है विचित्र है, मीडिया जैसे बालि का परम मित्र है।
ऋषिमुख पर नहीं ऋषि मुख में छिपा है सच्चाई का सुग्रीव,
सोच में पड़ा है हनुमान बल शिव,
जाति में बाट कर जामवंत बलबीर को,कब्जे में लेकर नल नील शिल्पगीर को,
सातों समुंदरो तक भवन बना रहा है।
मालिक बना हुआ सभी प्रकार की सेना का, जानता है मुफ्त में किसको है देना क्या, सबको लेके चंगुल में,
गा रहे हैं मंगल वे अपनी शांति खोने को कानून लाकर नए-नए, सही बता दूं सीता तो नहीं लेकिन शुख शांति को जरूर हरा है।
मेरे साथ तुम भी संकल्प ले लो मित्रों, साक्षात रावण तो सामने खड़ा है।

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हेमवन्त कुमार उपाध्याय

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