मध्यप्रदेश
भोपाल, । मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हर दूसरे रोज बेरोजगारी से परेशान होकर एक युवा आत्महत्या कर लेता है, वहीं राज्य में रोजगार कार्यालय में 15 साल में पंजीयन कराने वाले युवाओं में से एक प्रतिशत को भी नौकरी नहीं मिली है।

यह बात यहां गुरुवार को बेरोजगार सेना द्वारा जारी युवा अधिकारपत्र में कही गई है। बेरोजगार सेना के राष्ट्रीय प्रमुख अक्षय हुंका, विधि प्रकोष्ठ के शांतनु सक्सेना, प्रदेश संगठन मंत्री प्रदीप नापित, जिलाध्यक्ष ओम प्रकाश साहू, ग्रामीण जिलाध्यक्ष धीरज गोस्वामी,

विधि प्रकोष्ठ के जिलाध्यक्ष अमित सिंह, रोहित पांडेय, मोनू मिश्रा और दिनेश वर्मा ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में राज्य में बढ़ती बेरोजगारी के आंकड़े भी जारी किए। 
उन्होंने बताया कि राज्य की सबसे ज्वलंत समस्या बेरोजगारी है। सरकारी आंकड़े खुद इसकी गवाही देते हैं। गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय अपराध रिकर्ड ब्यूरो (एनसीईआरबी) द्वारा जारी की जाने वाली वार्षिक रिपोर्ट एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइडस इन इंडिया (एडीएसआई) के अनुसार,
मध्यप्रदेश में बेरोजगारी के कारण आत्महत्या करने वाले युवाओं की संख्या देश में सर्वाधिक है। केवल राजधानी भोपाल में ही हर दूसरे दिन एक युवा बेरोजगारी के कारण आत्महत्या कर रहा है।
हुंका ने एनसीईआरबी के आंकड़ों का जिक्र करते हुए बताया कि मध्यप्रदेश अपराधों में भी तीसरे नंबर पर है। मध्यप्रदेश में पिछले दो वर्षो में बेरोजगारी 53 फीसदी बढ़ गई है। रोजगार कार्यालय पूरी तरह विफल रहे हैं।
15 वर्षो में लगभग 57 लाख युवाओं ने रोजगार कार्यालयों में रजिस्ट्रेशन कराया है, लेकिन उनमें से एक को भी रोजगार कार्यालय नौकरी दिलाने में असफल रहे हैं।
सरकारी नौकरियों की स्थिति का ब्यौरा देते हुए हुंका ने बताया कि पिछले 10 वर्षो में जनसंख्या लगभग 20 प्रतिशत बढ़ गई है, लेकिन सरकारी नौकरियां बढ़ने की बजाय ढाई प्रतिशत कम हो गई हैं।
सरकार प्रदेश के युवाओं का हित संरक्षित रखने में असफल रही है, इसलिए ज्यादातर नौकरियों पर दूसरे प्रदेशों के लोग काबिज होते जा रहे हैं।

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युवा अधिकारपत्र के मुताबिक, “सरकार अब स्थायी नौकरी देने की जगह संविदा और दैनिक वेतनभोगी नौकरियों पर ज्यादा यकीन कर रही है।
नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे और मंझोले व्यापारियों की कमर तोड़ दी है।“

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