टीकमगढ़/छतरपुर। लगातार सूखे के कारण पलायन की त्रासदी झेल रहे बुंदेलखंड को महिलाओं का समूह ‘जल सहेली’ पानीदार बनाने में जुटा हुआ है। 400 सदस्यों वाला जल सहेली समूह उत्तर प्रदेश के झांसी, ललितपुर,

400 जल सहेलियों ने

हमीरपुर, जालौन और मध्य प्रदेश के टीकमगढ़, छतरपुर जिलों के 100 से ज्यादा गांवों में पानी बचाने और उसे संरक्षित करने की मुहिम चला चला रहा है। इन्हीं जिलों में पानी की स्थिति सबसे चिंताजनक है।
जल सहेलियों ने इन जिलों में अब तक 25 से ज्यादा तालाबों को संवारा और उनमें दोबारा पानी लाने में सफल रहीं। हमीरपुर, जालौन और ललितपुर की 60 ग्राम पंचायतों की जल सहेलियों ने तस्वीर ही बदल दी है। वहां, इन्होंने हैंडपंप सुधरवाकर, पानी की टंकी बनवाकर,
पाइपलाइन डलवाकर और अन्य उपाय कर पीने के पानी की समस्या हल करवाई है। अब ये जल सहेलियां ललितपुर, हमीरपुर और टीकमगढ़ के 50 तालाबों का जनसहयोग से गहरीकरण कर रही हैं। लक्ष्य है कि आगामी बारिश में ये पानी से लबालब हो जाएं।
जल सहेली समूह ने भोपाल में जल पंचायत में चंदेलकालीन तालाबों के गहरीकरण और उन्हें संवारने की जिम्मेदारी देने का आग्रह किया है। हालांकि इस पर फैसला बाकी है।
आठ साल पहले यानी 2011 में यूरोपियन यूनियन के सहयोग से परमार्थ सेवा संस्थान ने पानी पर महिलाओं की हकदारी परियोजना शुरू की थी। तब गांव में पानी पंचायतें बनीं। प्रत्येक पंचायत में 15 से 25 महिलाओं को जगह मिली। पानी व स्वच्छता, प्राकृतिक जल प्रबंधन को बढ़ावा देने दो महिलाओं को जल सहेली बनाया गया। तब से जल सहेलियां जुड़ती जा रही हैं।
प्रोजेक्ट मैनेजर शिवानी सिंह ने बताया कि चयनित जल सहेलियों को राजस्थान के अलवर स्थित जल और पर्यावरण कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह की संस्था में ट्रेनिंग के लिए भेजा जाता है। उन्होंने कहा कि वहां से लौटकर महिलाओं की पानी को लेकर सोच पूरी तरह बदल गई है। इसका उदाहरण- जालौन जिले का कुरौती गांव है। इस गांव के जलस्रोत वीरान और सूखे थे। वहां की महिलाओं के जल सहेली बनने के बाद जलस्रोत अब लोगों का सहारा बन गए हैं।

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